*क्या ग्रह हमारा भाग्य बदलते हैं?— भगवान शिव और पार्वती संवाद के आलोक में एक शास्त्रीय विवेचना*
🔱 प्रस्तावना:
सनातन धर्म में कर्म और भाग्य का प्रश्न सदैव गहन चर्चा का विषय रहा है। जब जीवन में सुख या दुख आता है, तो अक्सर उसका उत्तर हम ग्रहों-नक्षत्रों की ओर देखने में खोजते हैं। परंतु क्या यही सत्य है?
एक बार कैलास पर्वत पर पार्वती जी ने इसी विषय पर भगवान शिव से एक गूढ़ प्रश्न पूछा—जो आज भी हर जिज्ञासु की जिज्ञासा है।
❓ देवी पार्वती का प्रश्न:
> "भगवन्! आपने कहा कि हर प्राणी को अपने कर्मों का ही फल प्राप्त होता है। किंतु पृथ्वी पर यह देखा जाता है कि लोग अपने शुभ-अशुभ जीवन की दशा को केवल ग्रहों और नक्षत्रों का परिणाम मानते हैं। क्या यह मान्यता युक्तिसंगत है?"
🕉️ भगवान शिव का उत्तर:
भगवान शिव मुस्कुराए और उत्तर दिया:
> "केवलं ग्रहनक्षत्रं न करोति शुभाशुभम्।
सर्वमात्मकृतं कर्म लोकवादो गृहा इति॥"
> (शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता)
अर्थ:
ग्रह-नक्षत्र स्वयं शुभ या अशुभ नहीं करते। सम्पूर्ण शुभ-अशुभ फल जीव के अपने किए हुए कर्मों का परिणाम होता है। यह जो मान्यता है कि सब कुछ ग्रहों के कारण होता है — यह लोक में फैली एक जनश्रुति (प्रचलित भ्रम) मात्र है।
🪐 ग्रहों की भूमिका: सूचक, निर्माता नहीं
भगवान शिव स्पष्ट करते हैं कि:
ग्रह केवल संकेतक (indicator) होते हैं, जो मनुष्य के भूत एवं भविष्य के शुभ-अशुभ फल की सूचना देते हैं।
जैसे थर्मामीटर बुखार का संकेत देता है, पर वह स्वयं बुखार नहीं करता — उसी प्रकार ग्रह कर्मफल के द्योतक हैं, कारण नहीं।
🔁 कर्म और ग्रह: कारण-कार्य का सिद्धांत
> "यद्भविष्यति तत्तस्य ग्रहैर्लक्ष्यं यथाक्रमम्।"
(बृहज्जातक)
ज्योतिष शास्त्र कहता है कि जन्मपत्रिका में जो ग्रहदशा दिखती है, वह मनुष्य के पूर्वकर्मों की ही अभिव्यक्ति है। ग्रह फल देते नहीं, वे केवल बतलाते हैं कि तुमने क्या किया है और उसका फल कब मिलेगा।
🧘♂️ तो फिर ग्रह पूजन क्यों?
यह प्रश्न स्वाभाविक है — यदि ग्रह सिर्फ द्योतक हैं, तो उनकी पूजा क्यों की जाती है?
उत्तर यह है कि जैसे डॉक्टर के पास जाकर इलाज करवाते हैं, वैसे ही:
ग्रह पूजन, दान, जप, व्रत आदि 'कर्म' हैं, जो मन को शुद्ध करते हैं।
जब हम दोष निवारण के लिए कुछ सकारात्मक कर्म करते हैं, तो वर्तमान कर्म के कारण भविष्य सुधारने का अवसर मिलता है।
📜 शास्त्रों का स्पष्ट मत:
> "न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।"
(भगवद्गीता 3.4)
कर्म किए बिना कोई भी मनुष्य मुक्ति या शांति नहीं पा सकता।
इसलिए दोष मिटाने का उपाय 'कर्म' ही है — आत्म-संयम, सेवा, दान, उपासना, और आत्मान्वेषण।
🔚 उपसंहार:
ग्रह हमारे दर्पण हैं, निर्णयकर्ता नहीं।
भाग्य वही है जो हमने स्वयं अपने कर्मों से रचा है। शिव स्वयं यह स्पष्ट करते हैं कि “लोक में जो ग्रहों को दोष देते हैं, वे अपने कर्मों से मुंह मोड़ रहे हैं।”
अतः जीवन में कठिनाइयाँ आएँ तो सबसे पहले अपने भीतर झांकें, और ग्रहों की शांति के साथ-साथ अपने विचारों और कर्मों को भी शुद्ध करें।
🌺 शुभ कर्म ही श्रेष्ठ उपाय है।
> "शुभानि कर्माणि करोति यस्तु,
स एव लभते शुभमस्तु तस्मै॥
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