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विरह-ज्वर-विनाशकं ब्रह्म-शक्ति स्तोत्रम्-✍️

--------------------------------- विरह-ज्वर-विनाशकं ब्रह्म-शक्ति स्तोत्रम् --------------------------------- ।।श्रीशिवोवाच।। ब्राह्मि ब्रह्म-स्वरूपे त्वं, मां प्रसीद सनातनि ! परमात्म-स्वरूपे च, परमानन्द-रूपिणि !।। ॐ प्रकृत्यै नमो भद्रे, मां प्रसीद भवार्णवे। सर्व-मंगल-रूपे च, प्रसीद सर्व-मंगले !।। विजये शिवदे देवि ! मां प्रसीद जय-प्रदे।  वेद-वेदांग-रूपे च, वेद-मातः ! प्रसीद मे।। शोकघ्ने ज्ञान-रूपे च, प्रसीद भक्त वत्सले। सर्व-सम्पत्-प्रदे माये, प्रसीद जगदम्बिके!।। लक्ष्मीर्नारायण-क्रोडे, स्त्रष्टुर्वक्षसि भारती।  मम क्रोडे महा-माया, विष्णु-माये प्रसीद मे।। काल-रूपे कार्य-रूपे, प्रसीद दीन-वत्सले।  कृष्णस्य राधिके भदे्र, प्रसीद कृष्ण पूजिते!।। समस्त-कामिनीरूपे, कलांशेन प्रसीद मे। सर्व-सम्पत्-स्वरूपे त्वं, प्रसीद सम्पदां प्रदे!।। यशस्विभिः पूजिते त्वं, प्रसीद यशसां निधेः। चराचर-स्वरूपे च, प्रसीद मम मा चिरम्।। मम योग-प्रदे देवि ! प्रसीद सिद्ध-योगिनि। सर्वसिद्धिस्वरूपे च, प्रसीद सिद्धिदायिनि।। अधुना रक्ष मामीशे, प्रदग्धं विरहाग्निना। स्वात्म-दर्शन-पुण्येन, क्रीणीहि परमेश्वरि !।।...

*श्री सत्यनारायण अष्टकम*

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* श्रीसत्यनारायणाष्टकम् * आदिदेवं जगत्कारणं श्रीधरं  लोकनाथं विभुं व्यापकं शङ्करम् । सर्वभक्तेष्टदं मुक्तिदं माधवं  सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे || १ || सर्वदा लोक-कल्याण-पारायणं देव-गो-विप्र-रक्षार्थ-सद्विग्रहम् । दीन-हीनात्म-भक्ताश्रयं सुन्दरं  सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे || २ || दक्षिणे यस्य गङ्गा शुभा शोभते  राजते सा रमा यस्य वामे सदा । यः प्रसन्नाननो भाति भव्यश्च तं  सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे || ३ || संकटे समरे यं जनः सर्वदा  स्वात्मभीनाशनाय स्मरेत् पीडितः । पूर्णकृत्यो भवेद् यत्प्रसादाच्च तं  सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे || ४ || वाञ्छितं दुर्लभं यो ददाति प्रभुः  साधवे स्वात्मभक्ताय भक्तिप्रियः । सर्वभूताश्रयं तं हि विश्वम्भरं  सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे || ५ || ब्राह्मणः साधु-वैश्यश्च तुङ्गध्वजो येऽभवन् विश्रुता यस्य भक्त्याऽमरा । लीलया यस्य विश्वं ततं तं विभुं  सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे || ६ || येन चाब्रह्मबालतृणं धार्यते  सृज्यते पाल्यते सर्वमेतज्जगत् । भक्तभावप्रियं श्रीदयासागरं  सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे ||...

🪷सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्🪷

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🌸ॐ अस्य श्रीकुंजिकास्तोत्रमंत्रस्य सदाशिव ऋषिः, अनुष्टुप् छंदः श्रीत्रिगुणात्मिका देवता, ॐ ऐं बीजं, ॐ ह्रीं शक्तिः, ॐ क्लीं कीलकम्, मम सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।                       शिव उवाच- श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम् । येन मंत्रप्रभावेण चंडीजापः शुभो भवेत् ॥ 1 ॥ न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् । न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ॥ 2 ॥ कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् । अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥ 3 ॥ गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति । मारणं मोहनं वश्यं स्तंभनोच्चाटनादिकम् । पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥ 4 ॥ अथ मंत्रः - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे । ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ॥ 5 ॥ इति मंत्रः । नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि । नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥ 6 ॥ नमस्ते शुंभहंत्र्यै च निशुंभासुरघातिनि । जाग्रतं हि...

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का महत्व : भारतीय नववर्ष का प्रारंभ💐🌺🌺

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चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का महत्व : भारतीय नववर्ष का प्रारंभ भारतीय संस्कृति में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यही वह पावन तिथि है जिसे भारतीय नववर्ष का प्रारंभ माना जाता है। यह दिन केवल पंचांग की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, धार्मिक और प्राकृतिक दृष्टि से भी अत्यंत विशेष माना गया है। ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व सनातन परंपरा के अनुसार इस दिन अनेक महत्वपूर्ण घटनाएँ घटित हुई हैं— पुराणों के अनुसार ब्रह्माजी ने इसी दिन सृष्टि की रचना प्रारंभ की। महान सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन अपने राज्य की स्थापना की, जिसके आधार पर विक्रम संवत् का आरंभ माना जाता है। कई परंपराओं में भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक का दिन भी इसी तिथि से जुड़ा माना जाता है। नवरात्र का प्रारंभ भी इसी दिन से होता है, जिसमें शक्ति की उपासना के नौ दिव्य दिन प्रारंभ होते हैं। सिख परंपरा के दूसरे गुरु, गुरु अंगद देव जी का जन्मदिवस भी इसी तिथि को माना जाता है। सिंधी समाज के आराध्य भगवान झूलेलाल का प्राकट्य भी इसी दिन हुआ था। दक्षिण भारत में शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर राज्य स्थापना के लिए इसी...

श्री हरी स्तोत्रम्

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।। श्रीहरि स्तोत्रम् ।।           जगज्जालपालं चलत्कण्ठमालं                     शरच्चन्द्रभालं महादैत्यकालं।           नभोनीलकायं दुरावारमायं                     सुपद्मासहायम् भजेऽहं भजेऽहं।।          सदाम्भोधिवासं गलत्पुष्पहासं                     जगत्सन्त्रिवासं शतादित्यभासं।           गदाचक्रशस्त्रं लसत्पीतवस्त्रं                      हसच्चारुवक्त्रं भजेऽहं भजेऽहं।।          रमाकण्ठहारं श्रुतिव्रातसारं                      जलान्तर्विहारं धराभारहारं।          चिदानन्दरूपं मनोज्ञस्वरूपं                       ध्रुत...

“भाई दूज पर चित्रगुप्त आराधना – कर्म, धर्म और न्याय की साधना”

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🌸 चित्रगुप्त पूजा – न्याय, लेखा और कर्म की आराधना (भाई दूज / यम द्वितीया विशेष) 🔶 भूमिका दीपावली के पावन पर्व के दो दिन बाद आने वाली भाई दूज (यम द्वितीया) का दिन केवल भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक ही नहीं, बल्कि धर्म और न्याय के देवता चित्रगुप्त जी की आराधना का दिन भी है। इस दिन विशेषकर कायस्थ समाज अपने कुलदेवता चित्रगुप्त जी की पूजा करता है, परंतु इसका आध्यात्मिक संदेश सभी के लिए समान है — अपने कर्मों की समीक्षा करना और सत्य के लेखे में खरे उतरना। 🔶 चित्रगुप्त जी का परिचय चित्रगुप्त जी ब्रह्मा जी की काया से उत्पन्न हुए — इसलिए उनका नाम पड़ा “कायस्थ”। “चित्र” का अर्थ है स्पष्ट और बोधगम्य, और “गुप्त” का अर्थ है गुप्त रूप से जानने वाला। इस प्रकार चित्रगुप्त वह दिव्य शक्ति हैं जो प्रत्येक जीव के कर्मों का सूक्ष्म लेखा-जोखा रखती है। यमराज जब किसी आत्मा का निर्णय करते हैं, तो चित्रगुप्त जी के लेखे के आधार पर ही न्याय होता है। 🔶 चित्रगुप्त पूजा का महत्व यह दिन हमें स्मरण कराता है कि— > “कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते, हर कार्य का फल निश्चित है।” चित्रगुप्त जी की पूजा का अर्थ है — ...

🪔"पाँच दिनों का दीप उत्सव : दीपावली के प्रत्येक दिवस का आध्यात्मिक अर्थ"✍️

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🌺 दीपोत्सव के पाँच दिन : धनतेरस से भाई दूज तक की परंपरा और पूजा-विधि 🌺 भारत की संस्कृति में दीप केवल प्रकाश का प्रतीक नहीं, बल्कि अंधकार पर ज्ञान की विजय का स्मरण है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से लेकर शुक्ल पक्ष की द्वितीया तक पाँच दिनों का यह दीपोत्सव जीवन में स्वास्थ्य, समृद्धि, धर्म और प्रेम के मूल्यों को जगाने वाला पर्व है। इन पाँच दिनों में — धनतेरस, रूप चौदस, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज — प्रत्येक का अपना महत्व और संदेश है। 🔶 1. धनतेरस (धन्वंतरि जयंती) कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन धनतेरस मनाई जाती है। इस दिन भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्होंने ही आयुर्वेद का प्राकट्य किया था, इसलिए यह दिन स्वास्थ्य और दीर्घायु का प्रतीक है। परंपरा व पूजन-विधि : इस दिन घर में टूटे-फूटे पुराने बर्तन निकालकर नए बर्तन, विशेषकर चाँदी के बर्तन खरीदने की परंपरा है। इन बर्तनों में भगवान गणेश और देवी लक्ष्मी की मूर्तियाँ रखकर पूजन किया जाता है। पूजन के समय यह मंत्र बोला जाता है — “यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये। धनधान्यसम...