✍️पार्थिव शिवलिंग, रुद्राभिषेक और अभिषेक सामग्री का पौराणिक और शास्त्रीय महत्व 🔱 1. पार्थिव शिवलिंग का महत्व पार्थिव का अर्थ होता है "मिट्टी से निर्मित"। पार्थिव शिवलिंग की पूजा विशेष फलदायक मानी जाती है, विशेषकर तब जब व्यक्ति को स्थायी शिवलिंग की स्थापना या नियमित मंदिर दर्शन की सुविधा न हो। 📜 पौराणिक एवं शास्त्रीय आधार: पद्म पुराण, लिंग पुराण, स्कंद पुराण एवं शिव पुराण में पार्थिव लिंग पूजा को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। शिव पुराण में कहा गया है: > "पार्थिवं लिङ्गमादाय यस्तु पूजयते शिवम्। स याति परमं स्थानं शिवेन सह मोदते॥" अर्थ: जो व्यक्ति पार्थिव लिंग का पूजन करता है, वह शिव के परम धाम को प्राप्त करता है। भगवान श्रीराम ने रामेश्वरम में पार्थिव शिवलिंग बनाकर रुद्राभिषेक किया था। पाण्डवों ने भी अज्ञातवास के समय पार्थिव लिंग की पूजा की थी। 🕉️ 2. रुद्राभिषेक के प्रकार रुद्राभिषेक का अर्थ है – भगवान शिव पर विविध वस्तुओं से अभिषेक कर ‘रुद्र’ के मंत्रों द्वारा उनका पूजन करना। इसके मुख्य प्रकार हैं: प्रकार विवरण 🔹 सामान्य रुद्राभिषेक रुद्र सूक्त या शिव पंचाक्ष...
भूमिका : कृतज्ञता की संस्कृति सनातन धर्म का एक अद्भुत पुष्प है कृतज्ञता। माता-पिता ने हमें जन्म दिया, पाला-पोसा, संस्कार दिए। उनके जीवन रहते सेवा करना धर्म है, किंतु उनके देहावसान के बाद भी उनके कल्याण का भाव रखना और उनके अधूरे कार्यों को पूरा करना ही श्राद्ध कहलाता है। यह केवल एक कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि आभार, स्मरण और कृतज्ञता की संस्कृति है। श्राद्ध का दार्शनिक आधार शास्त्र कहते हैं – मृत्यु के बाद जीवात्मा अपने कर्मानुसार स्वर्ग, नरक या पितृलोक में जाती है। जो पितृयान मार्ग से जाते हैं, वे चन्द्रलोक में अमृतान्न का सेवन करते हैं। यह अन्न कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा की कलाओं के साथ क्षीण होता है। इसलिए वंशजों को इस अवधि में श्राद्ध, पिण्डदान और तर्पण करना आवश्यक है। वैज्ञानिक एवं प्रतीकात्मक दृष्टि अक्सर शंका की जाती है कि यहाँ दिया गया अन्न पितरों तक कैसे पहुँचता है? इसे समझना सरल है – जैसे रुपया डॉलर और पाउंड में परिवर्तित होकर विदेश में मिल सकता है, वैसे ही ईश्वर की सर्वसमर्थ सत्ता हमारे द्वारा अर्पित अन्न को पितरों तक उनके योग्य रूप में पहुँचा देती है। आज जब दूरभाष व दूरदर्...
🌼 भाद्रपद शुक्ल पक्ष तीजा व्रत (हरितालिका तीज) 🌼 ✨ व्रत का महत्व भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरितालिका तीज कहा जाता है। यह व्रत विशेषतः सुहागिन स्त्रियों और कन्याओं द्वारा अखण्ड सौभाग्य, दांपत्य सुख और शिव-पार्वती जैसे अटूट दाम्पत्य के लिए किया जाता है। 🕉️ व्रत-विधि 1. प्रातःकाल स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 2. व्रती स्त्रियाँ निर्जल अथवा फलाहार व्रत का संकल्प लें। 3. मिट्टी अथवा रज से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाकर पूजा स्थान पर स्थापित करें। 4. कलश-स्थापना करें और उसमें जल, आम्रपल्लव, नारियल रखें। 5. अब दीप प्रज्वलित कर धूप, फूल, फल, वस्त्र आदि से शिव-पार्वती का पूजन करें। 6. सुहाग-सामग्री अर्पित करें और कथा का श्रवण करें। 7. रात्रि जागरण कर अगले दिन प्रातः पारण करें। मंत्र-पाठ (पूजा के साथ) 1. शिव स्तुति मंत्र ॐ नमः शिवाय शान्ताय सौम्याय सुखदाय च। भक्तानामभयदाय नमः शंकराय ते॥ 2. पार्वती स्तुति मंत्र सदा सौम्या सदा शान्ता सदा सौभाग्यदायिनी। पातु मां पार्वती देवी महाशक्ति नमोऽस्तु ते॥ 3. संकल्प मंत्र मम अखण्ड-सौभाग्य-लाभ-परिपूर्ण-दाम्पत्य-सुख-स...
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