भूमिका : कृतज्ञता की संस्कृति सनातन धर्म का एक अद्भुत पुष्प है कृतज्ञता। माता-पिता ने हमें जन्म दिया, पाला-पोसा, संस्कार दिए। उनके जीवन रहते सेवा करना धर्म है, किंतु उनके देहावसान के बाद भी उनके कल्याण का भाव रखना और उनके अधूरे कार्यों को पूरा करना ही श्राद्ध कहलाता है। यह केवल एक कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि आभार, स्मरण और कृतज्ञता की संस्कृति है। श्राद्ध का दार्शनिक आधार शास्त्र कहते हैं – मृत्यु के बाद जीवात्मा अपने कर्मानुसार स्वर्ग, नरक या पितृलोक में जाती है। जो पितृयान मार्ग से जाते हैं, वे चन्द्रलोक में अमृतान्न का सेवन करते हैं। यह अन्न कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा की कलाओं के साथ क्षीण होता है। इसलिए वंशजों को इस अवधि में श्राद्ध, पिण्डदान और तर्पण करना आवश्यक है। वैज्ञानिक एवं प्रतीकात्मक दृष्टि अक्सर शंका की जाती है कि यहाँ दिया गया अन्न पितरों तक कैसे पहुँचता है? इसे समझना सरल है – जैसे रुपया डॉलर और पाउंड में परिवर्तित होकर विदेश में मिल सकता है, वैसे ही ईश्वर की सर्वसमर्थ सत्ता हमारे द्वारा अर्पित अन्न को पितरों तक उनके योग्य रूप में पहुँचा देती है। आज जब दूरभाष व दूरदर्...
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