।। श्रीसेतुबन्ध रामेश्वर ।।
इस ज्योतिर्लिङ्ग की स्थापना मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचन्द्रजी ने की थी। इसके विषय में यह कथा कही जाती है- जब भगवान श्रीरामचन्द्र जी लंका पर चढ़ाई करने के लिये जा रहे थे तब इसी स्थान पर उन्होंने समुद्र तट की वालु से शिवलिङ्ग बनाकर उसका पूजन किया था। ऐसा भी कहा जाता है कि इस स्थान पर ठहरकर भगवान राम जल पी रहे थे कि आकाशवाणी हुई कि 'मेरी पूजा किये बिना ही जल पीते हो ?' इस वाणी को सुनकर भगवान श्री राम ने बालु से शिवलिङ्ग बनाकर उसकी पूजा की तथा भगवान शिव से रावण पर विजय प्राप्त करने का वर माँगा। उन्होंने प्रसन्नता के साथ यह वर भगवान श्रीराम को दे दिया। भगवान शिव ने लोक कल्याणार्थ ज्योतिर्लिङ्ग के रूप में वहाँ निवास करने की सबकी प्रार्थना भी स्वीकार कर ली। तभी से यह ज्योतिर्लिङ्ग यहाँ विराजमान है। इस ज्योतिर्लिङ्ग के विषय में एक-दूसरी कथा इस प्रकार कही जाती है- जब भगवान श्री राम, रावण का वध करके लौट रहे थे तब उन्होंने अपना पहला पड़ाव समुद्र के इस पार गन्धमा...