“भाई दूज पर चित्रगुप्त आराधना – कर्म, धर्म और न्याय की साधना”
🌸 चित्रगुप्त पूजा – न्याय, लेखा और कर्म की आराधना
(भाई दूज / यम द्वितीया विशेष)
🔶 भूमिका
दीपावली के पावन पर्व के दो दिन बाद आने वाली भाई दूज (यम द्वितीया) का दिन केवल भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक ही नहीं, बल्कि धर्म और न्याय के देवता चित्रगुप्त जी की आराधना का दिन भी है।
इस दिन विशेषकर कायस्थ समाज अपने कुलदेवता चित्रगुप्त जी की पूजा करता है, परंतु इसका आध्यात्मिक संदेश सभी के लिए समान है — अपने कर्मों की समीक्षा करना और सत्य के लेखे में खरे उतरना।
🔶 चित्रगुप्त जी का परिचय
चित्रगुप्त जी ब्रह्मा जी की काया से उत्पन्न हुए — इसलिए उनका नाम पड़ा “कायस्थ”।
“चित्र” का अर्थ है स्पष्ट और बोधगम्य, और “गुप्त” का अर्थ है गुप्त रूप से जानने वाला।
इस प्रकार चित्रगुप्त वह दिव्य शक्ति हैं जो प्रत्येक जीव के कर्मों का सूक्ष्म लेखा-जोखा रखती है।
यमराज जब किसी आत्मा का निर्णय करते हैं, तो चित्रगुप्त जी के लेखे के आधार पर ही न्याय होता है।
🔶 चित्रगुप्त पूजा का महत्व
यह दिन हमें स्मरण कराता है कि—
> “कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते, हर कार्य का फल निश्चित है।”
चित्रगुप्त जी की पूजा का अर्थ है — अपने विचारों, कर्मों और जीवन के लेखे को शुद्ध करना।
व्यवसाय, लेखन, प्रशासन या किसी भी कार्य में सत्य और ईमानदारी के मार्ग पर चलने की प्रेरणा इस पूजन से मिलती है।
🔶 पूजा-विधि (संक्षेप में)
1. स्थान शुद्ध करें: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह कर पूजा स्थल बनाएं।
2. आसन व स्थापना: कलश स्थापित कर चित्रगुप्त जी की तस्वीर या प्रतीक रखें।
3. सामग्री: कलम, दवात, कागज़, पुष्प, चावल, दीपक, पान, सुपारी, मिश्री आदि।
4. संकल्प: “आज मैं अपने कर्मों की समीक्षा कर धर्मनिष्ठ जीवन का संकल्प लेता हूँ।”
5. पूजन मंत्र:
> ॐ श्री चित्रगुप्ताय नमः
6. आरती या स्तुति:
> जय चित्रगुप्त दयालु स्वामी, सब पापों को हरने वाले।
लेख जोख का रखे हिसाब, सब जीवों के हित करने वाले॥
7. प्रसाद: मिश्री, कलम, पान या लेखन सामग्री अर्पित कर परिवार के बीच वितरित करें।
🔶 भाई दूज का भाव
इस दिन यमराज ने अपनी बहन यमुना के घर जाकर तिलक करवाया था।
इसी स्मृति में यह दिन “यम द्वितीया” कहलाया।
भाई दूज और चित्रगुप्त पूजा का मेल इस बात का प्रतीक है कि संबंधों में स्नेह और जीवन में धर्म – दोनों का संतुलन ही सच्चा दीपावली प्रकाश है।
🔶 उपसंहार
चित्रगुप्त जी की पूजा हमें यह सिखाती है कि जीवन केवल कमाने और पाने का नहीं, बल्कि गिनने और समझने का भी है।
हर कर्म का लेखा किसी और के पास नहीं, हमारे ही भीतर लिखा जाता है।
इस दिन का असली दीपक वही है, जो मन के लेखे को उजाला दे।
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