✨ सोलह कला की परंपरा — ईश्वर से जड़ पदार्थ तक✍️
✨ सोलह कला की परंपरा — ईश्वर से जड़ पदार्थ तक
📜 “जहाँ पूर्णता होती है, वहाँ कलाओं का वास होता है”
🔷 "कला" का आध्यात्मिक अर्थ
"कला" शब्द संस्कृत की धातु 'कल्' से बना है, जिसका अर्थ है —
> “भरना”, “सजाना”, “पूर्ण करना”।
🔹 अतः कला वह शक्ति है जो चेतनता, प्रतिभा, गुण, और ब्रह्मतत्त्व की अभिव्यक्ति करती है।
शास्त्रों में कला को “ईश्वर की पूर्णता के अंश” कहा गया है।
जैसे चंद्रमा की कलाएं बढ़ती-घटती हैं, वैसे ही जीवों में भी ईश्वर की कलाएं विभिन्न मात्रा में होती हैं।
🔱 १. भगवान श्रीकृष्ण — षोडशकलासंपन्न
श्रीमद्भागवत महापुराण (स्कंध 10) में कहा गया है—
> "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्"
अर्थात् — श्रीकृष्ण स्वयं परम भगवान हैं।
👉 वे षोडश कला (१६ कला) से पूर्ण हैं, अतः उन्हें ही "पूर्णावतार" कहा गया है।
📘 चांदोग्य उपनिषद (7.26.2) कहता है —
> "यो वै एष एतस्मिन्नन्तः पुरुषः सोऽसावाद्य: षोडशकलः"
— वह पुरुष जो ब्रह्म के भीतर स्थित है, सोलह कलाओं से युक्त है।
🪔 श्रीकृष्ण की १६ कलाएं — एक दृष्टि
(विभिन्न शास्त्रों में भिन्न रूपों में वर्णित, कुछ मुख्य कलाएं:)
1. श्री – समृद्धि
2. भानु – तेज
3. लीला – दिव्य क्रीड़ा
4. ज्ञान – सर्वज्ञता
5. वैराग्य – आसक्ति रहितता
6. धर्म – धर्म स्थापना
7. कीर्ति – दिव्य यश
8. करुणा – परोपकार
9. सौंदर्य – रूप माधुर्य
10. सत्य – अडोल सत्यता
11. अहिंसा – करुणा में स्थिरता
12. संगीत – सुर की पूर्णता
13. नृत्य – भावों की गतिमत्ता
14. शांति – समता में स्थिति
15. माया – योगमाया नियंत्रण
16. पूर्णता – सबका समन्वय
📌 इन कलाओं से युक्त होने के कारण श्रीकृष्ण सभी देवों के भी अधिष्ठाता हैं।
👤 २. मनुष्य — ४ कलाओं का धारक
शास्त्रों के अनुसार मनुष्य ईश्वर का अंशावतार है —
> "अंशेन जीवाः" — जीव ईश्वर के अंश हैं।
किंतु ये अंश सीमित कलाओं के साथ आते हैं।
🔹 मनुष्य में सामान्यतः ४ कलाएं सक्रिय होती हैं:
1. विवेक — क्या उचित है, क्या अनुचित
2. स्मृति — सीखने व अनुभव को संचित रखने की क्षमता
3. कर्मशक्ति — संकल्प और क्रियान्वयन
4. भावना — प्रेम, दया, भक्ति
🪔 यह ईश्वरीय कृपा है कि मनुष्य "साधना द्वारा" कलाओं की संख्या बढ़ा सकता है।
यही योग, तप, भक्ति और ज्ञान का लक्ष्य है — जीव से शिव की यात्रा।
🐦 ३. पशु-पक्षी — केवल २ कलाओं तक सीमित
पशु-पक्षियों में मुख्यतः २ कलाएं होती हैं:
1. अन्नमय शक्ति – भक्षण, पोषण
2. प्राणमय शक्ति – जीवन धारण, रक्षा
👉 वे स्वभावतः कर्म करते हैं, परंतु उनमें विवेक और ज्ञान का अभाव होता है।
इसलिए वे न पुण्य अर्जन कर सकते हैं, न पाप से उबर सकते हैं।
🪨 ४. जड़ पदार्थ — कला शून्य, पर ब्रह्म स्पर्शयुक्त
जड़ तत्वों में (पर्वत, जल, वायु आदि) कोई कला नहीं, किंतु फिर भी वे ब्रह्म से अभिन्न हैं।
> "वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्" — ईशोपनिषद्
— जड़ भी उसी परम तत्व से जुड़े हैं, पर उनमें चेतना नहीं।
🧘 ५. साधना से कैसे बढ़ती हैं कलाएं?
मनुष्य अपनी चतुर कलाओं का परिष्कार कर, ईश्वर की ओर बढ़ सकता है।
यह निम्नलिखित साधनों से संभव है:
ज्ञानयोग → विवेक की वृद्धि
भक्तियोग → भावना की शुद्धता
कर्मयोग → कर्मशक्ति की नियमन
राजयोग/ध्यान → स्मृति व आत्मबोध
📖 भगवद्गीता (4.11) —
> "ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्"
— जैसे-जैसे मनुष्य मेरी ओर आता है, वैसे-वैसे मैं उसे अपनी कलाओं से पूरित करता हूँ।
🌸 सार
स्थिति कलाएं विशेषता
भगवान १६ (पूर्ण) परिपूर्ण, ब्रह्मस्वरूप
ऋषि/देव ८–१२ उच्च चेतना, दिव्यगुण
मनुष्य ४ विवेकयुक्त, आत्मोन्नति की पात्रता
पशु-पक्षी २ स्वाभाविक जीवन, विवेकहीनता
जड़ पदार्थ ० अस्तित्व है, चेतना नहीं
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