मनुष्य का मन ✍️









मनुष्य का मन – यह सबसे शक्तिशाली, परंतु सबसे चंचल अंग है। यह कभी स्थिर नहीं रहता, न जाने कितनी दिशाओं में दौड़ता रहता है — कभी भविष्य की चिंता में, कभी अतीत के पछतावे में। श्रीमद्भगवद्गीता, जो केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान है, चंचल मन को नियंत्रित करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली उपाय प्रस्तुत करती है।

मन की चंचलता: गीता में वर्णन

भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अर्जुन को यह स्वीकार करते हैं कि —
"चञ्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥"
(अध्याय 6, श्लोक 34)

अर्थात् — "हे कृष्ण! मन अत्यंत चंचल, बलवान और हठी है। इसे वश में करना वायु को रोकने के समान कठिन है।"

यह श्लोक दर्शाता है कि मन की गति और उसकी अस्थिरता कोई नई समस्या नहीं, यह सदा से मानव स्वभाव का हिस्सा रही है।

श्रीमद्भगवद्गीता का समाधान: मन का नियंत्रण कैसे करें?

1. अभ्यास (Practice) और वैराग्य (Detachment):

"अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥"
(अध्याय 6, श्लोक 35)

भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि मन को नियंत्रण में लाने के दो मुख्य उपाय हैं —

अभ्यास (नियमित अभ्यास)

वैराग्य (असक्ति से रहित होना)


नियमित ध्यान, स्वाध्याय, और आत्मचिंतन से मन को एकाग्र किया जा सकता है। साथ ही, भौतिक इच्छाओं से स्वयं को थोड़ी दूरी पर रखना भी आवश्यक है।

2. ध्यान और आत्मनिष्ठा:

गीता में बताया गया है कि व्यक्ति जब ध्यान के माध्यम से अपने अंतरात्मा से जुड़ता है, तब चंचल मन शांति पाता है।
ध्यान न केवल मन को नियंत्रित करता है, बल्कि उसे आत्मा की शुद्धता का अनुभव भी कराता है।


3. इंद्रियों का संयम:

भगवान कहते हैं —
"इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।"
(अध्याय 3, श्लोक 40)
मन इंद्रियों का राजा है। यदि इंद्रियाँ भटक जाएँ तो मन भी भटकता है। इसलिए संयमित जीवनशैली, संतुलित खानपान, और सही संगति से मन पर नियंत्रण संभव है।

चंचल मन को सही दिशा देना क्यों जरूरी है?

चंचल मन दुख का कारण बनता है।

यह व्यक्ति को वर्तमान से काट देता है।

मन की चंचलता ही मोह, लोभ, ईर्ष्या और भय को जन्म देती है।


जब मन ध्यान, सेवा, स्वाध्याय, और कर्तव्य की ओर लग जाता है, तब वह न केवल शांत होता है बल्कि उत्कृष्ट कर्म की दिशा में अग्रसर होता है।

श्रीमद्भगवद्गीता यह सिखाती है कि चंचल मन को दबाने की आवश्यकता नहीं, बल्कि उसे मार्गदर्शित करने की आवश्यकता है।
भगवद्गीता का पठन, मनन और अभ्यास व्यक्ति को केवल शांति ही नहीं देता, बल्कि उसे आत्मज्ञान, संतुलन और कर्मयोग की ओर ले जाता है।

आज के युग में जब मन अनगिनत विकर्षणों से घिरा है, तब गीता का यह अमर संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है —
"मन को जीतो, दुनिया अपने आप जीत जाओगे।"

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