गुरु पूर्णिमा विशेष, ✍️
🌕 गुरु पूर्णिमा: शिष्यभाव की पवित्र पूर्णता
गुरु—यह शब्द केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांडीय ज्ञान का स्रोत है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाई जाने वाली गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का एक ऐसा पर्व है, जो जीवन को आलोकित करने वाले उस तत्व को समर्पित है, जिसे 'गुरु' कहा जाता है। यही कारण है कि इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन भगवान वेदव्यास जी का अवतरण हुआ था।
🕉️ गुरु शब्द का अर्थ और महत्व
संस्कृत में "गुरु" शब्द दो धातुओं से बना है —
"गु" अर्थात् अंधकार, और
"रु" अर्थात् उसका नाश करने वाला।
अर्थात गुरु वह है जो अज्ञानरूपी अंधकार का नाश कर ज्ञानरूपी प्रकाश प्रदान करता है।
🔸 स्कंदपुराण में गुरु की महिमा वर्णित है —
> "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥"
📜 गुरु पूर्णिमा का पौराणिक इतिहास
🧘♂️ 1. आदि गुरु शिव:
योग परंपरा के अनुसार, आज ही के दिन आदि योगी भगवान शिव ने सप्तर्षियों को योग का प्रथम ज्ञान प्रदान किया। अतः शिव को आदि गुरु कहा गया। इस प्रकार, गुरु परंपरा का प्रारंभ यहीं से माना जाता है।
📖 2. व्यासजी का जन्म:
इस दिन वेदव्यास जी, जिन्होंने चार वेदों का संहिताकरण, महाभारत की रचना तथा 18 पुराणों की रचना की, उनका जन्म हुआ। इसलिए यह दिन व्यास पूर्णिमा भी कहलाता है और सभी शास्त्रों के रचयिता को नमन करने का दिन भी।
> "व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे।
नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः॥"
> (महाभारत, आदिपर्व)
🌿 गुरु के चरणों में शरण क्यों?
श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
> "तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥"
(गीता 4.34)
अर्थात – ज्ञान को जानने के लिए विनयपूर्वक गुरु के चरणों में जाओ, प्रश्न करो, सेवा करो – तब वे तुम्हें आत्मतत्त्व का बोध कराएंगे।
🔱 गुरु की महिमा पुराणों में
1. पद्म पुराण में कहा गया है—
> "गुरोः कृपया यथालभ्यं तत्त्वं ज्ञेयं मनीषिभिः।
नान्यथा शतजन्मान्तेऽपि सिद्धं न भवेत्क्वचित्॥"
गुरु की कृपा से ही तत्वज्ञान की प्राप्ति होती है, अन्यथा सौ जन्मों में भी वह दुर्लभ है।
2. स्कन्द पुराण में वर्णित है—
> "नास्ति गुरुसमो दैवम् नास्ति गुरुसमा गतिः।
नास्ति गुरुसमं त्राणं नास्ति गुरुसमा प्रपा॥"
गुरु के समान कोई देवता नहीं, कोई मार्ग नहीं, कोई रक्षा नहीं और कोई आश्रय नहीं।
🪔 गुरु पूर्णिमा पर क्या करें?
🔹 प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
🔹 अपने जीवन के गुरुओं – माता-पिता, आचार्य, या आध्यात्मिक गुरु – का आशीर्वाद लें।
🔹 वेदव्यास जी की पूजा करें।
🔹 शास्त्र पठन, ध्यान, और गुरु उपदेश का श्रवण करें।
🔹 किसी योग्य गुरु का स्मरण करके उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लें।
✨ शिष्य का आदर्श भाव
मनुस्मृति कहती है:
> "आचार्य देवो भव"
गुरु को देवता मानना ही सच्चा शिष्यत्व है।
तैत्तिरीय उपनिषद में भी यह आदर्श भाव आता है:
> "श्रद्धया देयं, श्रद्धया सेवया" – श्रद्धा और सेवा से ही गुरु को तुष्ट किया जा सकता है।
💠 उपसंहार (निष्कर्ष)
गुरु पूर्णिमा हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन की वास्तविक यात्रा केवल सांसारिक उपलब्धियों की नहीं, आत्मिक उत्थान की है – और इस यात्रा के पथ-प्रदर्शक हैं गुरु। वेदव्यास जी हों, शिव हों या श्रीकृष्ण—सभी ने यह संदेश दिया है कि "गुरु विना गति नहीं"।
> "गुरवे सर्वलोकानां विष्णवे स्थावरजंगमम्।
नित्यं यज्ञमयं तस्मै श्री गुरवे नमः॥"
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