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Showing posts from August, 2025

🌺संतान सप्तमी व्रत 🌺

मुक्ताभरण संतान सप्तमी विशेष ==================== भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की सप्तमी का व्रत अपना विशेष महत्व रखता है। संतान सप्तमी व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष कि सप्तमी तिथि के दिन किया जाता है। इस वर्ष 30 अगस्त शनिवार के दिन मुक्ताभरण संतान सप्तमी व्रत किया जाएगा। यह व्रत विशेष रुप से संतान प्राप्ति, संतान रक्षा और संतान की उन्नति के लिये किया जाता है। इस व्रत में भगवान शिव एवं माता गौरी की पूजा का विधान होता है।  संतान सप्तमी व्रत विधि  -------------------------------- सप्तमी का व्रत माताओं के द्वारा  अपनी संतान के लिये किया जाता है। इस व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विधान है। इस व्रत में अपराह्न तक पूजा-अर्चना करने का विधान है। इस व्रत को करने वाली माता को प्रात:काल में स्नान और नित्यक्रम क्रियाओं से निवृ्त होकर, स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद प्रात काल में श्री  भगवान शिव पार्वती की पूजा अर्चना करनी चाहिए। और सप्तमी व्रत का संकल्प लेना चाहिए। निराहार व्रत कर, दोपहर को चौक पूरकर चंदन, अक्षत, धूप, दीप, नैवेध, सुपारी तथा नारियल आदि से फिर से...

🌺 ऋण मोचन महा गणपति स्तोत्र एवं ऋण और दरिद्रता से मुक्ति का दिव्य उपाय,🌺

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🍁 ऋणमोचन महागणपति स्तोत्र: ऋण और दरिद्रता से मुक्ति का दिव्य उपाय भारतीय परंपरा में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता कहा गया है। हर शुभ कार्य की शुरुआत गणेश पूजन से होती है। ब्रह्माण्डपुराण में वर्णित ऋणमोचन महागणपति स्तोत्र विशेष रूप से ऋण से मुक्ति, दरिद्रता नाश और जीवन में सुख-समृद्धि लाने वाला माना गया है। 📖 ऋणमोचन महागणपति स्तोत्र का महत्व जो साधक इस स्तोत्र का प्रातःकाल नियमित पाठ करता है, उसके जीवन में छः माह के भीतर ऋण का निवारण होने लगता है। यह स्तोत्र न केवल आर्थिक ऋण मिटाता है बल्कि मानसिक बोझ और जीवन की अड़चनें भी दूर करता है। गणपति की आराधना के साथ यदि ऋणहर गणेश स्तोत्र, गणेशलक्ष्मी स्तोत्र, गणेश अष्टकम और गणपति चालीसा-आरती का पाठ किया जाए, तो साधक के पारिवारिक जीवन से दरिद्रता का नाश होकर समृद्धि आने लगती है। 🌺 पूजन विधि और नियम समय : प्रातःकाल स्नान करके गणेश प्रतिमा/चित्र के सामने बैठें। सामग्री : दूर्वा (दूब घास), लाल-पीले पुष्प, गुड़ या मोदक का भोग, दीप और धूप। ध्यान : रक्तवर्ण, त्रिनेत्र, चन्द्रमौलि स्वरूप वाले महागणपति का ध्यान कर...

🌺काशी के युवराज ढुंढीराज गणपति: हर खोज के अधिपति🌺

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प्रस्तावना,,🙏 गंगा की लहरों पर झिलमिलाती आरती, घंटों की गूंज से भरी काशी की रात्री। जहाँ हर गली में शिव का वास है, वहाँ युवराज ढुंढीराज का भी त्रास है। कहते हैं— काशी के द्वार पर सबसे पहले स्वागत करते हैं बाल गणपति। जो खोजो, वही मिल जाए—ऐसे हैं ढुंढीराज। स्वयं महादेव ने स्वीकारा— "काशी में मेरा प्रवेश भी पुत्र गणेश के प्रसाद से ही सम्भव हुआ।" इसीलिए इस अनंत पुरी में हर साधक की पहली प्रार्थना ढुंढीराज को समर्पित होती है। जहाँ स्वयं शिव भी पुत्र की अनुमति से प्रवेश पाए कथा है—जब भगवान शंकर ने काशी में निवास करने का निश्चय किया, तब वे पुरी के द्वार पर पहुँचे। वहाँ बाल स्वरूप में गणेश खड़े थे। शिव ने कहा— “बेटा, मुझे काशी में प्रवेश दो।” गणेश मुस्कराकर बोले— “बाबा! यहाँ का विधान अलग है। जब तक मैं प्रसन्न न होऊँ, कोई प्रवेश नहीं पा सकता। आप भी इस नियम से बाहर नहीं।” शिव विस्मित हुए और बोले— “सत्य है। इस पुरी में मेरा आगमन भी तुम्हारे प्रसाद से ही हुआ है। जो कार्य पिता के लिए भी कठिन हो, पुत्र से वह सरल हो जाता है। इसका उदाहरण मैं स्वयं हूँ।” ढुंढने से लेकर मोक्ष तक का...

🌺अष्टविनायक: आठों स्वयंभू गणेश और उनकी चमत्कारिक कथाएँ🌺

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🌸 अष्टविनायक यात्रा: कथा, भक्ति और महिमा 🌸 परिचय महाराष्ट्र में आठ स्वयंभू गणेशजी इतने प्रसिद्ध हैं कि उन्हें एक साथ अष्टविनायक कहा जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि जो भक्त इन आठ गणेशजी की परिक्रमा करता है, उसके जीवन से सभी विघ्न दूर होते हैं और उसे बुद्धि, सिद्धि और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस यात्रा की शुरुआत और समापन मोरेश्वर (मोरेगांव) से होती है। आइए जानते हैं क्रमवार आठों गणेशजी की विस्तृत कथाएँ, स्थान और महिमा— 1️⃣ मोरेश्वर गणपति (मोरेगांव, पुणे) बहुत समय पहले, सिंधुरासुर नामक दैत्य ने पृथ्वी पर अराजकता फैला दी थी। वह न केवल देवताओं के लिए, बल्कि साधारण मनुष्यों के लिए भी संकट बन गया था। लोग, राजा और ऋषि सब उसकी क्रूरता से पीड़ित थे। देवताओं ने ब्रह्माजी से प्रार्थना की कि इस संकट का नाश कौन करेगा। ब्रह्मा ने गणेशजी की ओर इशारा किया। गणेशजी मोर पर सवार होकर युद्धभूमि में आए। उनका तेजस्वी रूप देखकर दैत्य डर गया, पर उसने हार नहीं मानी। गणेशजी ने अपनी बुद्धि और दिव्य शक्ति से दैत्य का संहार किया। तब से मोरेश्वर की कृपा से सभी भक्त विघ्नों से मुक्त ...

🌼 भाद्रपद शुक्ल तृतीया: हरितालिका तीज व्रत का महत्व, कथा और विधि

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🌼 भाद्रपद शुक्ल पक्ष तीजा व्रत (हरितालिका तीज) 🌼 ✨ व्रत का महत्व भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरितालिका तीज कहा जाता है। यह व्रत विशेषतः सुहागिन स्त्रियों और कन्याओं द्वारा अखण्ड सौभाग्य, दांपत्य सुख और शिव-पार्वती जैसे अटूट दाम्पत्य के लिए किया जाता है। 🕉️ व्रत-विधि 1. प्रातःकाल स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 2. व्रती स्त्रियाँ निर्जल अथवा फलाहार व्रत का संकल्प लें। 3. मिट्टी अथवा रज से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाकर पूजा स्थान पर स्थापित करें। 4. कलश-स्थापना करें और उसमें जल, आम्रपल्लव, नारियल रखें। 5. अब दीप प्रज्वलित कर धूप, फूल, फल, वस्त्र आदि से शिव-पार्वती का पूजन करें। 6. सुहाग-सामग्री अर्पित करें और कथा का श्रवण करें। 7. रात्रि जागरण कर अगले दिन प्रातः पारण करें। मंत्र-पाठ (पूजा के साथ) 1. शिव स्तुति मंत्र ॐ नमः शिवाय शान्ताय सौम्याय सुखदाय च। भक्तानामभयदाय नमः शंकराय ते॥ 2. पार्वती स्तुति मंत्र सदा सौम्या सदा शान्ता सदा सौभाग्यदायिनी। पातु मां पार्वती देवी महाशक्ति नमोऽस्तु ते॥ 3. संकल्प मंत्र मम अखण्ड-सौभाग्य-लाभ-परिपूर्ण-दाम्पत्य-सुख-स...

✨ “कनकधारा स्तोत्र : शंकराचार्य की करुणा से झरी स्वर्णधारा” ✨

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🌺कनकधारा स्तोत्र की कथा🌺 ✍️ आदि शंकराचार्य का जीवन जितना गूढ़ और अलौकिक था, उतना ही करुणा से भरा हुआ भी। कनकधारा स्तोत्र की कथा उनकी संवेदना और करुणा का अनुपम उदाहरण है। कहते हैं, केरल के कालड़ी गाँव में बालक शंकर अपने अल्पायु में ही संन्यास लेकर ज्ञानयात्रा पर निकल पड़े थे। एक दिन वे भिक्षा की तलाश में एक दरवाजे पर पहुँचे। घर बहुत साधारण था, दरिद्रता मानो उस परिवार की चौखट पर स्थायी डेरा डाले बैठी थी। घर की गृहिणी एक ब्राह्मणी थी। उसके पास देने को कुछ भी नहीं था। बालक संन्यासी के सामने खाली हाथ लौटाना उसे उचित न लगा। बड़ी विवशता से उसने अपने घर में खोजबीन की, तो बस एक सूखी आंवला (आँवले का फल) ही मिल सका। उसने संकोच और आँसुओं के साथ वही फल अपनी हथेली पर रखकर शंकर को भेंट कर दिया। शंकराचार्य उस स्त्री की निःस्वार्थ भावनाओं से भीतर तक हिल गए। उन्होंने सोचा – “जिसने अपनी भूख की परवाह न करते हुए अंतिम अन्न का अंश मुझे दे दिया, क्या इस घर में सदैव अभाव और कष्ट बने रहेंगे?” उनका हृदय करुणा से पिघल गया और उन्होंने वहीं बैठकर माता लक्ष्मी की स्तुति में 21 अद्भ...

🌺“मार्कण्डेय और चन्द्रशेखराष्टकम् : अमरत्व की अमर कथा”🌺

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🌙 चन्द्रशेखराष्टकम् की कथा 🌙 ✍️ द्वापर युग में एक तपस्वी ऋषि थे – ऋषि मृकण्डु। वे वेद-वेदांगों के ज्ञाता थे, किंतु एक अभाव उन्हें निरंतर खटकता था— संतान का सुख। दिन-रात वे भगवान शिव की कठोर तपस्या करने लगे। अंततः महादेव प्रकट हुए और बोले— "वत्स! मांगो, क्या चाहते हो?" ऋषि ने हाथ जोड़कर कहा— "प्रभो! मुझे एक तेजस्वी पुत्र चाहिए।" शिव मुस्कराए— **"तुम्हें दो विकल्प मिलते हैं— 1. एक मूर्ख पुत्र, जो दीर्घायु होगा। 2. एक बुद्धिमान, तेजस्वी पुत्र, जिसकी आयु केवल १६ वर्ष होगी।"** ऋषि और उनकी पत्नी ने विचार किया और बोले— "हे देव! हमें अल्पायु ही सही, परंतु तेजस्वी पुत्र चाहिए।" 🌿 समय बीता, पुत्र जन्मा। उसका नाम रखा गया मार्कण्डेय। बालक असाधारण था— छोटी आयु में ही वेदों का ज्ञाता, भक्ति और तेजस्विता का प्रतिरूप। ऋषि मृकण्डु गर्वित थे, परंतु माता-पिता के मन में छिपा हुआ दुःख हर दिन उन्हें सताता— १६वाँ वर्ष आते ही यह पुत्र हमें छोड़ देगा! ☀️ जैसे-जैसे १६वाँ वर्ष निकट आने लगा, वातावरण बोझिल हो गया। माता-पिता रोने लगे। मार्कण्डेय ने कारण पूछा। ज...

✍️ मेहनत की कमाई का महत्व 🌺

🌺मेहनत की कमाई का महत्व, 🌺  बनारस नगरी में एक विद्वान पंडित जी का विशाल आश्रम था। यह आश्रम शिक्षा और संस्कारों का केंद्र माना जाता था। दूर-दूर से शिष्य वहाँ शिक्षा ग्रहण करने आते। पंडित जी बड़े धैर्य और गंभीरता से वेद-पुराण, शास्त्र और धर्मशिक्षा का पाठ पढ़ाते थे। आश्रम के ठीक सामने एक साधारण-सा बढ़ई अपनी दुकान लगाए बैठता था। वह दिन भर लकड़ी का काम करता और साथ ही मधुर स्वर में भजन गाता रहता। उसकी आवाज़ में ऐसी मिठास थी कि सुनने वाला अनायास ही ठहर जाए। किंतु आश्रम के पंडित जी और उनके शिष्य अपने अध्ययन और शिक्षण में इतने व्यस्त रहते कि बढ़ई के भजनों पर ध्यान नहीं देते। समय बीतता रहा। एक दिन पंडित जी गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। बीमारी इतनी बढ़ी कि वे पढ़ाने योग्य नहीं रहे। शिष्यों को जब लगा कि शिक्षा अब नियमित रूप से नहीं हो पाएगी, तो अधिकांश शिष्य आश्रम छोड़कर चले गए। केवल कुछ सेवाभावी शिष्य ही गुरुजी की सेवा में लगे रहे। उन्होंने तरह-तरह के वैद्य और हकीम बुलाए, औषधियाँ दिलवाईं, परंतु बीमारी ज्यों की त्यों बनी रही। अब पंडित जी दिन भर बिस्तर पर लेटे रहते। ऐसे ही एक दिन उनका ध्यान आश्...

🌺केतु ग्रह का ज्योतिषीय महत्व और गहन विवेचन✍️

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🔹 1. केतु का परिचय केतु भी राहु की तरह वास्तविक ग्रह नहीं है, बल्कि छाया ग्रह है। खगोल विज्ञान में इसे दक्षिण चंद्रग्रहण बिंदु (South Node) कहा जाता है। ज्योतिष शास्त्र में केतु को आध्यात्मिकता, मोक्ष, वैराग्य और अदृश्य शक्तियों का कारक माना गया है। यह भौतिक सुखों से विरक्ति और अध्यात्म की ओर झुकाव लाने वाला ग्रह है। 🔹 2. केतु की स्थिति और स्वामित्व स्वामी राशि – स्थायी स्वामित्व नहीं, परंतु वृश्चिक और मीन से विशेष संबंध। उच्च राशि – वृश्चिक (Scorpio) नीच राशि – वृषभ (Taurus) मित्र ग्रह – मंगल, शुक्र शत्रु ग्रह – सूर्य, चंद्र तटस्थ ग्रह – बुध, शनि 🔹 3. केतु का गुण, स्वभाव और तत्व तत्व – अग्नि तत्व गुण – तमोगुण प्रधान, परंतु अध्यात्म में रूपांतरित स्वभाव – रहस्यमय, वैरागी, तपस्वी, मोक्षदायक रंग – धूसर, धूमिल धातु – मिश्र धातुएँ रत्न – लहसुनिया (Cat’s Eye – वैदूर्य मणि) 🔹 4. केतु का प्रभाव सकारात्मक स्थिति में – अध्यात्म, मोक्ष, योग-साधना, तंत्र-मंत्र, ज्योतिष, आयुर्वेद, दर्शनशास्त्र, और गूढ़ विद्याओं में सफलता देता है। नकारात्म...

🌑 राहु ग्रह का ज्योतिषीय महत्व और गहन विवेचन, ✍️

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🔹 1. राहु का परिचय राहु कोई वास्तविक ग्रह (Planet) नहीं है, बल्कि छाया ग्रह है। खगोल की दृष्टि से यह वह बिंदु है जहाँ चंद्रमा की कक्षा सूर्य की कक्षा (क्रांतिवृत्त) को काटती है। इसे उत्तर चंद्रग्रहण बिंदु (North Node) कहा जाता है। ज्योतिष में राहु को रहस्यमयी, अप्रत्याशित और भौतिकवाद का कारक माना गया है। 🔹 2. राहु की स्थिति और स्वामित्व स्वामी राशि – कोई स्थायी स्वामित्व नहीं, परंतु आधुनिक मत में कुंभ और वृषभ से विशेष संबंध माना गया है। उच्च राशि – वृषभ (Taurus) नीच राशि – वृश्चिक (Scorpio) मित्र ग्रह – शुक्र, बुध, शनि शत्रु ग्रह – सूर्य, चंद्र, मंगल तटस्थ ग्रह – गुरु 🔹 3. राहु का गुण, स्वभाव और तत्व तत्व – वायु तत्व गुण – तमोगुण प्रधान स्वभाव – छल, माया, भ्रम, महत्वाकांक्षा, विदेशी प्रभाव, अचानक घटना रंग – धूम्रवर्ण (काला-सलेटी) धातु – सीसा, इलेक्ट्रॉनिक धातुएँ रत्न – गोमेद (Hessonite Garnet) 🔹 4. राहु का प्रभाव 1. सकारात्मक स्थिति में – राहु व्यक्ति को राजनीति, विदेशी व्यापार, विज्ञान, अनुसंधान, जादू-टोना, रहस्यविद्या, आधुनिक तकनीक और सामाजिक प्रभाव में सफलता देता है।...

🪐 शनि ग्रह का ज्योतिषीय महत्व और गहन विवेचन✍️

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🔹 1. शनि का परिचय शनि सौरमंडल का छठा ग्रह है और अपने अद्भुत वलयों (rings) के कारण विशेष पहचान रखता है। ज्योतिष में यह सबसे प्रभावशाली और गंभीर ग्रह माना गया है। शनि को कर्मफलदाता, न्यायप्रिय और अनुशासनप्रिय ग्रह कहा गया है। यह धीमी गति से चलता है और प्रत्येक राशि में लगभग 2.5 वर्ष तक स्थित रहता है। 🔹 2. शनि की स्वामित्व राशि और स्थिति स्वामी राशि – मकर और कुंभ उच्च राशि – तुला (Libra) नीच राशि – मेष (Aries) मित्र ग्रह – बुध, शुक्र शत्रु ग्रह – सूर्य, चंद्र, मंगल तटस्थ ग्रह – बृहस्पति 🔹 3. शनि का गुण, स्वभाव और तत्व तत्व – वायु तत्व गुण – तमोगुण प्रधान स्वभाव – न्यायप्रिय, अनुशासक, कठोर लेकिन निष्पक्ष रंग – काला, नीला धातु – लोहा रत्न – नीलम (Blue Sapphire) 🔹 4. शनि का प्रभाव 1. सकारात्मक स्थिति में – शनि व्यक्ति को परिश्रमी, धैर्यवान, न्यायप्रिय, योगी, दृढ़ इच्छाशक्ति वाला और महान कर्मयोगी बनाता है। 2. नकारात्मक स्थिति में – आलस्य, निराशा, अवसाद, अन्याय, कष्ट, विलंब, गरीबी और संघर्ष प्रदान करता है। 🔹 5. शनि की विशेष अवधियाँ साढ़ेसाती (7½ वर्ष) – जब शनि जन्म चंद्र राशि ...

🌸 शुक्र ग्रह : ज्योतिष में महत्व और गहन विवेचन🌟

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🌿 प्रस्तावना नवग्रहों में शुक्र (Venus) को असुराचार्य कहा गया है। यह सौंदर्य, प्रेम, कला, भोग-विलास, भौतिक सुख, स्त्री, वाहन और वैभव का कारक ग्रह है। जन्मकुंडली में शुक्र की स्थिति व्यक्ति के सौंदर्यबोध, दाम्पत्य जीवन, कला, आकर्षण, धन और भोग को निर्धारित करती है। 👉 जीवन में प्रेम, आकर्षण और विलासिता की लालसा शुक्र से ही आती है। 🌿 शुक्र का दैवी स्वरूप शुक्राचार्य महर्षि भृगु के पुत्र और असुरों के गुरु हैं। इनका वर्ण गोरा और तेजस्वी बताया गया है। देवताओं के विपरीत, शुक्राचार्य ने असुरों को जीवनोपयोगी विद्याएँ सिखाईं और मृतसंजीवनी विद्या के ज्ञाता माने गए। 📜 बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (अध्याय 3, श्लोक 23) भार्यां सौख्यं कलां कान्तिं तारुण्यं भार्यसुखं सुखम्।   विलासं रूपमायुष्यं ददाति शुक्रीयो ग्रहः॥ 👉 “स्त्री, सौंदर्य, कला, यौवन, दाम्पत्य सुख, विलास और आयु – ये सभी शुक्र ग्रह प्रदान करते हैं।” 🌿 ज्योतिष में शुक्र का स्थान वृषभ और तुला राशि का स्वामी। मीन राशि में उच्च (27°) और कन्या राशि में नीच। शुक्र का दिन शुक्रवार है। दिशा → दक्षिण-पूर्व (आग्नेय)। 🌿 शुक्र के...

📚 गुरु ग्रह : ज्योतिष में महत्व और गहन विवेचन🌟

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🌿 प्रस्तावना नवग्रहों में गुरु (बृहस्पति) को देवताओं का गुरु कहा गया है। यह ज्ञान, धर्म, नीति, सदाचार, संतान और समृद्धि का कारक है। जन्मकुंडली में गुरु की स्थिति व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रवृत्ति, शिक्षा, नैतिकता, संतान सुख और भाग्य को दर्शाती है। 👉 जीवन में सद्बुद्धि, न्यायप्रियता, और धर्म के प्रति आस्था गुरु के प्रभाव से ही आती है। 🌿 गुरु का दैवी स्वरूप गुरु को बृहस्पति भी कहा जाता है और ये अंगिरस ऋषि के पुत्र माने गए हैं। इनका स्वरूप पीतवर्ण, गंभीर और तेजस्वी है। इन्हें विद्या, वेद, धर्म, ऋषित्व और देवताओं के आचार्य का प्रतीक माना गया है। 📜 बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (अध्याय 3, श्लोक 20) देवानां गुरुर्वृद्धश्च देहिनां जीवनो बृहः।   ज्ञानी च विवेकश्च वाक्समी यो बृहस्पतिः॥ 👉 “देवताओं के गुरु, वृद्ध, जीवन देने वाले, ज्ञानवान, विवेकी और मधुरवक्ता – वही बृहस्पति हैं।” 🌿 ज्योतिष में गुरु का स्थान धनु और मीन राशि का स्वामी। कर्क राशि में उच्च (5°) और मकर राशि में नीच। पूर्व, ईशान और उत्तर-पूर्व दिशा पर गुरु का आधिपत्य है। गुरु का दिन गुरुवार माना गया है। 🌿 गुरु के क...

🌿 बुध ग्रह : ज्योतिष में महत्व और गहन विवेचन💚

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🌿 प्रस्तावना✍️ नवग्रहों में बुध को युवराज कहा गया है। यह ज्ञान, वाणी, बुद्धि और तर्कशक्ति का प्रतीक है। जन्मकुंडली में बुध की स्थिति व्यक्ति की शिक्षा, व्यापार, संचार-कौशल, निर्णय क्षमता और मित्र संबंधों को प्रभावित करती है। 👉 जो व्यक्ति वाक्पटु, चतुर, गणनाशील और कूटनीति में दक्ष होता है, उसके पीछे बुध का प्रभाव अवश्य होता है। 🌿 बुध का दैवी स्वरूप बुध को शास्त्रों में चन्द्र और तारा (बृहस्पति-पुत्री) का पुत्र माना गया है। इसे हरित वर्ण (हरा) और युवा, तेजस्वी, वाक्पटु बताया गया है। पुराणों में बुध को विद्या, वाणी, व्यापार और चतुराई का अधिष्ठाता कहा गया है। 📜 बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (अध्याय 3, श्लोक 15) बुधो बुद्धिविनोदश्च विद्वान् प्रियदर्शनः।   नवमे बालवर्णश्च कृतज्ञो हर्षवर्द्धनः॥ 👉 “बुध बुद्धि में विनोदी, विद्वान, प्रियदर्शी, बालक के समान सौम्य वर्ण का, कृतज्ञ और हर्षवर्धक है।” 🌿 ज्योतिष में बुध का स्थान मिथुन और कन्या राशि का स्वामी। कन्या में उच्च (15°) और मीन में नीच। बुध का स्वभाव तटस्थ है – शुभ ग्रहों के साथ हो तो शुभ फल, अशुभ के साथ हो तो अशुभ फल देत...

🍀 प्राण क्या है ? और उसका स्वरूप क्या है?🍀

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🍀 प्राण क्या है और उसका स्वरूप 🍀 ✦ प्रस्तावना “प्राण” शब्द हम अपने जीवन में अनेक बार प्रयोग करते हैं। अक्सर लोग इसे आत्मा या जीवात्मा का पर्याय मान लेते हैं, परंतु यह भ्रांति है। वास्तव में प्राण वायु का ही सूक्ष्म रूप है। जब वही वायु शरीर के भीतर दस प्रकार से कार्य करती है तो उसे प्राण कहा जाता है। उपनिषद कहते हैं— “प्राणो हि भूतानामायुः” (छान्दोग्य उपनिषद १.११.५) अर्थात् समस्त प्राणियों का जीवन प्राण ही है। ✦ प्राण का स्वरूप प्राण अदृश्य, सूक्ष्म, चञ्चल और गतिशील शक्ति है। यह शरीर की समस्त क्रियाओं का आधार है। वायु के बिना जैसे सृष्टि का संचालन असंभव है, वैसे ही प्राण के बिना जीवित शरीर क्षणभर भी टिक नहीं सकता। प्राण ही भोजन को पचाता है, धातुओं का निर्माण करता है और अंगों को शक्ति देता है। वास्तव में प्राण ही जीवन है और प्राण का वियोग ही मृत्यु है। ✦ प्राण और शरीर का संबंध जब जीवात्मा शरीर में प्रवेश करता है तो प्राण भी साथ आता है। और जब जीवात्मा शरीर छोड़ देता है, तो प्राण भी उसके साथ चला जाता है। शरीर के विश्राम अवस्था (नींद) में भी प्राण निरंत...

मंगल ग्रह का प्रभाव : ज्योतिषीय दृष्टि से✍️

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मंगल ग्रह का प्रभाव : ज्योतिषीय दृष्टि से 1. प्रस्तावना✍️ ज्योतिष शास्त्र में मंगल ग्रह को शक्ति, पराक्रम और ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। यह ग्रह मानव जीवन में साहस, बल, उत्साह और संघर्ष की भावना को जागृत करता है। सूर्य आत्मा है, चंद्रमा मन है और मंगल शरीर की शक्ति तथा कर्म का अधिपति है। इसे ग्रहों का सेनापति कहा गया है। 2. मंगल का शास्त्रीय महत्व मंगल को भूमिपुत्र कहा गया है, क्योंकि यह पृथ्वी तत्व से जुड़ा है। यह ग्रह रक्त, मांसपेशियाँ और जीवनशक्ति का नियंत्रक है। पुराणों में मंगल को श्री शिव और भूमि देवी के पुत्र के रूप में वर्णित किया गया है। यह ग्रह साहस, भूमि-संपत्ति और सैन्य बल का कारक है। 3. मंगल का भौतिक व ज्योतिषीय स्वरूप मंगल एक अग्नि प्रधान ग्रह है, इसका रंग लाल है और यह ऊर्जा, जोश तथा गुस्से का प्रतीक है। इसका प्रभाव व्यक्ति को परिश्रमी, तेजस्वी और निर्णायक बनाता है। मंगल एक राशि में लगभग 45 दिन तक रहता है। यह ग्रह मेष और वृश्चिक राशि का स्वामी है, जबकि मकर में उच्च और कर्क में नीच का होता है। 4. मंगल के प्रभाव क्षेत्र शरीर पर प्रभाव...

🌺चंद्रमा का प्रभाव : ज्योतिषीय दृष्टि से🌛

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1. प्रस्तावना✍️ भारतीय ज्योतिष में चंद्रमा को मन और भावनाओं का अधिपति माना गया है। सूर्य आत्मा का प्रतीक है तो चंद्रमा मन का। यह जीवन में मानसिक स्थिति, भावनाओं, कल्पनाशक्ति और स्मरणशक्ति को नियंत्रित करता है। ग्रहों में चंद्रमा को रानी कहा गया है, जो कोमलता, संवेदनशीलता और शांति का द्योतक है। 2. चंद्रमा का शास्त्रीय महत्व मनसो जातः चंद्रमाः (ऋग्वेद) – चंद्रमा मन से उत्पन्न हुआ। यह सौम्य ग्रह है, शुभफलदाता है और प्रत्येक जीव के मानसिक स्वास्थ्य, सुख-दुःख और प्रसन्नता का दर्पण है। चंद्रमा के बिना किसी भी कुंडली का विश्लेषण अधूरा माना जाता है, क्योंकि चंद्र लग्न (राशि) ही दैनिक जीवन पर सीधा असर डालती है। 3. चंद्रमा का भौतिक व ज्योतिषीय स्वरूप चंद्रमा का गोचर अत्यंत तीव्र है, यह मात्र 2 दिन 6 घंटे 40 मिनट में एक राशि बदलता है। चंद्रमा की गति के कारण ही तिथि, पक्ष और मास का निर्धारण होता है। यह रात्रि का राजा और शीतलता का दाता है। 4. चंद्रमा के प्रभाव क्षेत्र शरीर पर प्रभाव – रक्त, जल तत्व, द्रव पदार्थ, मस्तिष्क व हृदय पर इसका नियंत्रण है। मन पर प्रभाव – मन की चंचलता, कल्पनाशक्...

सूर्य ग्रह : ज्योतिष में महत्व और गहन विवेचन✍️

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सूर्य ग्रह : ज्योतिष में महत्व और गहन विवेचन 🌞 प्रस्तावना ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को नवग्रहों का अधिपति और आत्मा का प्रतीक माना गया है। सूर्य केवल आकाश में प्रकाश और उष्णता देने वाला ग्रह ही नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन, व्यक्तित्व और आत्मिक शक्ति का आधार भी है। जन्मकुंडली में सूर्य की स्थिति मनुष्य के तेज, आत्मविश्वास, प्रतिष्ठा, स्वास्थ्य और सामाजिक सम्मान को निर्धारित करती है। 🌞 सूर्य का दैवी स्वरूप सूर्य को वेदों में सविता, आदित्य, भास्कर, मित्र, पूषा आदि नामों से संबोधित किया गया है। ऋग्वेद (1.50.10) में कहा गया है— > "उद्वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्त उत्तरा। देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्॥" 👉 “हम अंधकार से निकलकर उस ज्योतिर्मय सूर्य को देखते हैं, जो समस्त देवताओं में भी सर्वोच्च प्रकाशस्वरूप है।” पुराणों में सूर्य को सप्ताश्वरथी (सात घोड़ों के रथ पर आरूढ़) बताया गया है। ये सात घोड़े इन्द्रियों के नियंत्रण और सात रंगों के प्रकाश का द्योतक हैं। सूर्य देव का वर्णन भगवान विष्णु के तेजस्वी अंश के रूप में भी हुआ है। 🌞 ज्योतिष में सूर्य का स्थान बृहत्...

✍️ निरंतरता और परिणाम : सफलता की असली चाबी🌺🌺

🙏🌺 प्रस्तावना जीवन में सफलता पाने का कोई शॉर्टकट नहीं होता। प्रेरणा क्षणिक है, परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, लेकिन जो चीज़ हर लक्ष्य को संभव बनाती है, वह है निरंतरता। निरंतरता का अर्थ निरंतरता का मतलब केवल बड़े-बड़े काम करना नहीं है, बल्कि हर दिन छोटे-छोटे कदम उसी दिशा में बढ़ाते रहना है। चाहे पढ़ाई हो, लेखन हो, व्यायाम हो या कोई नया कौशल सीखना—यदि आप नियमित रूप से अभ्यास करते हैं, तो धीरे-धीरे परिणाम आपके सामने आने लगते हैं। उदाहरण : बांस का पेड़ चीन में बांस (Bamboo) का पेड़ बोने के बाद पहले पाँच वर्षों तक जमीन के ऊपर कुछ दिखाई नहीं देता। किसान लगातार पानी देता है, खाद डालता है, देखभाल करता है, लेकिन कोई अंकुर नहीं निकलता। लोग मजाक भी उड़ाते हैं कि मेहनत बेकार जा रही है। लेकिन पाँच साल बाद अचानक वही बांस कुछ ही हफ्तों में 80-90 फीट ऊँचा हो जाता है। असल में पाँच साल तक बांस अपनी जड़ों को गहराई तक फैला रहा होता है। यही निरंतरता का जादू है—काम लंबे समय तक अदृश्य रहता है, परंतु अचानक परिणाम विस्फोटक रूप में सामने आते हैं। निरंतरता और प्रेरणा का अंतर प्रेरणा क्षणिक है, मूड और परिस्थितियो...

✍️पंचमहाभूत और मानव जीवन🌺

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🕉️ पंचमहाभूत – अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल और आकाश प्रस्तावना भारतीय दर्शन के अनुसार यह सृष्टि केवल पदार्थों का संयोग नहीं है, बल्कि चेतना और पंचमहाभूतों का अद्भुत मेल है। वेद, उपनिषद, पुराण और आयुर्वेद सभी में पंचतत्त्व – आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी – को सृष्टि का आधार माना गया है। 1️⃣ सृष्टि-विकास और पंचमहाभूत तैत्तिरीय उपनिषद और सांख्य दर्शन बताते हैं कि परमात्मा से → महत्तत्त्व (बुद्धि) → अहंकार → तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) और अंततः पंचमहाभूत प्रकट हुए। आकाश से ध्वनि और स्थान वायु से गति और स्पर्श अग्नि से रूप और प्रकाश जल से रस और प्रवाह पृथ्वी से गंध और स्थिरता यही पाँच तत्त्व मिलकर सम्पूर्ण सृष्टि, शरीर और इन्द्रियों का निर्माण करते हैं। 2️⃣ आयुर्वेद और योग में पंचमहाभूत आयुर्वेद – त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) पंचमहाभूतों से बने हैं। योग – चक्र साधना में प्रत्येक चक्र का संबंध किसी न किसी तत्त्व से है। मूलाधार – पृथ्वी स्वाधिष्ठान – जल मणिपुर – अग्नि अनाहत – वायु विशुद्ध – आकाश 3️⃣ पंचमहाभूत और उनके देवता तत्त्व गुण/आधार अधिष्ठाता देवता उपासना-विधि फल आकाश...

. “ऊर्जा संतुलन की कुंजी – सात चक्र और सरल दैनिक अभ्यास”✍️

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🌸 सात चक्र: ऊर्जा, चेतना और संतुलन की यात्रा भारतीय योग और तंत्र परंपरा में मनुष्य को केवल हड्डी-मांस का ढांचा नहीं, बल्कि चेतना का अद्भुत केंद्र माना गया है। इस चेतना को प्रवाहित करने वाले सात मुख्य ऊर्जा केंद्र (चक्र) बताए गए हैं। ये चक्र रीढ़ (Merudanda) के आधार से लेकर सिर के शीर्ष तक फैले हुए हैं और जीवन के हर पहलू – शरीर, मन और आत्मा – को प्रभावित करते हैं। यदि ये चक्र संतुलित हों तो जीवन में स्वास्थ्य, शांति और आनंद बना रहता है। परंतु इनके असंतुलित होने पर भय, क्रोध, अस्थिरता, रोग और मानसिक उलझनें बढ़ सकती हैं। आइए, सातों चक्रों को समझें और जानें कि इन्हें कैसे सरल ध्यान और दैनिक अभ्यास से संतुलित किया जा सकता है। 1️⃣ मूलाधार चक्र (Muladhara Chakra) – स्थिरता का केंद्र स्थान : रीढ़ का आधार तत्व : पृथ्वी रंग : लाल बीज मंत्र : "लं" गुण : स्थिरता, सुरक्षा, आधार संतुलन उपाय: नंगे पैर धरती पर चलें। ध्यान में लाल प्रकाश की कल्पना करें। “लं” मंत्र का उच्चारण करें। 🕉 5 मिनट का अभ्यास गहरी साँस लेते हुए रीढ़ के आधार पर ध्यान लगाएँ। कल्पना...

🕉 पंचकोश – शरीर से आत्मा तक की यात्रा(तैत्तिरीय उपनिषद के आधार पर)

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प्रस्तावना ✍️ भारतीय वेदांत दर्शन के अनुसार मनुष्य केवल हड्डी-मांस का पुतला नहीं, बल्कि चेतना का एक अद्भुत आवरण है। तैत्तिरीय उपनिषद (ब्रह्मानंदवल्ली) में मनुष्य को पाँच आवरणों (कोशों) में विभाजित किया गया है, जिन्हें पंचकोश कहा जाता है। "कोश" का अर्थ है — आवरण या परत, जो आत्मा को ढकते हैं। आत्मा स्वयं शुद्ध, नित्य, चैतन्यमय है, लेकिन ये पाँच परतें उसे भौतिक और मानसिक अनुभवों से जोड़ती हैं। 2️⃣ पंचकोश का शास्त्रीय उल्लेख तैत्तिरीय उपनिषद में कहा गया है— > "अन्नमय आत्मा, प्राणमय आत्मा, मनोमय आत्मा, विज्ञानमय आत्मा, आनन्दमय आत्मा" — (तैत्तिरीय उपनिषद, ब्रह्मानंदवल्ली) यहाँ "आत्मा" शब्द का प्रयोग प्रत्येक स्तर पर आत्मा के आवरण के अर्थ में हुआ है। 3️⃣ पंचकोश का क्रम व विवरण ① अन्नमय कोश (भौतिक शरीर) अर्थ – ‘अन्न’ से बना हुआ आवरण। घटक – अस्थि, मांस, रक्त, चर्म आदि। कार्य – भोजन और पोषण से जीवन बनाए रखना। शास्त्रीय दृष्टि – > "अन्नं वै प्रजाः प्रजायन्ते, याः काश्च पृथिवीं श्रिताः" – (तै. उ.) सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं और अन्न...