✍️ मेहनत की कमाई का महत्व 🌺

🌺मेहनत की कमाई का महत्व, 🌺 

बनारस नगरी में एक विद्वान पंडित जी का विशाल आश्रम था। यह आश्रम शिक्षा और संस्कारों का केंद्र माना जाता था। दूर-दूर से शिष्य वहाँ शिक्षा ग्रहण करने आते। पंडित जी बड़े धैर्य और गंभीरता से वेद-पुराण, शास्त्र और धर्मशिक्षा का पाठ पढ़ाते थे।

आश्रम के ठीक सामने एक साधारण-सा बढ़ई अपनी दुकान लगाए बैठता था। वह दिन भर लकड़ी का काम करता और साथ ही मधुर स्वर में भजन गाता रहता। उसकी आवाज़ में ऐसी मिठास थी कि सुनने वाला अनायास ही ठहर जाए। किंतु आश्रम के पंडित जी और उनके शिष्य अपने अध्ययन और शिक्षण में इतने व्यस्त रहते कि बढ़ई के भजनों पर ध्यान नहीं देते।

समय बीतता रहा। एक दिन पंडित जी गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। बीमारी इतनी बढ़ी कि वे पढ़ाने योग्य नहीं रहे। शिष्यों को जब लगा कि शिक्षा अब नियमित रूप से नहीं हो पाएगी, तो अधिकांश शिष्य आश्रम छोड़कर चले गए। केवल कुछ सेवाभावी शिष्य ही गुरुजी की सेवा में लगे रहे। उन्होंने तरह-तरह के वैद्य और हकीम बुलाए, औषधियाँ दिलवाईं, परंतु बीमारी ज्यों की त्यों बनी रही।

अब पंडित जी दिन भर बिस्तर पर लेटे रहते। ऐसे ही एक दिन उनका ध्यान आश्रम के बाहर से आ रही भजन की मधुर ध्वनि पर गया। यह वही बढ़ई था, जो रोज की तरह अपने काम में मग्न होकर गा रहा था। पंडित जी ने पहली बार उसकी वाणी की मिठास को आत्मा से महसूस किया। धीरे-धीरे वे भजनों को सुनने के लिए प्रतीक्षा करने लगे। उनका मन बीमारी से हटकर भजनों की ओर लगने लगा।

कुछ ही दिनों में पंडित जी ने अनुभव किया कि उनके दुख और पीड़ा में कमी आ रही है। एक दिन उन्होंने अपने शिष्य को भेजकर बढ़ई को आश्रम बुलवाया। जब वह आया तो पंडित जी ने कहा—
“बेटा, तुम्हारे भजनों में अद्भुत शक्ति है। बड़े-बड़े वैद्य मुझे स्वस्थ नहीं कर पाए, पर तुम्हारे मधुर भजन सुनकर मेरी आत्मा को शांति मिली है और मैं रोगमुक्त होने लगा हूँ। यह सौ स्वर्ण मुद्राएँ मैं तुम्हें भेंट करता हूँ। प्रतिदिन इसी प्रकार भजन गाते रहना।”

बढ़ई के लिए यह अप्रत्याशित प्रसन्नता का क्षण था। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि बिना मेहनत किए उसे इतना धन मिल जाएगा। वह बहुत खुश हुआ और मुद्राएँ लेकर अपने घर चला गया।

किन्तु धीरे-धीरे उसमें परिवर्तन आने लगा। अब उसका ध्यान अपने काम से हटने लगा। वह सोचने लगा कि जब बिना कठिन परिश्रम के इतना धन मिल सकता है, तो और किस प्रकार ऐसा धन अर्जित किया जाए। धीरे-धीरे उसके भजनों की भावपूर्ण गूँज भी कम हो गई। लकड़ी का काम उसने लापरवाही से करना शुरू कर दिया, जिसके कारण उसके काम की गुणवत्ता गिर गई और ग्राहक भी घटने लगे।

साथ ही, स्वर्ण मुद्राओं को लेकर उसके मन में भय और चिंता घर करने लगी। वह रात-दिन सोचता कि कहीं यह धन चोरी न हो जाए। जिस सरल और संतुष्ट जीवन में वह पहले आनंदित रहता था, वहाँ अब बेचैनी और अशांति ने जगह ले ली।

एक दिन जब उसकी आत्मा ने उसे झकझोरा तो उसने गहराई से विचार किया। उसे समझ में आया कि इन स्वर्ण मुद्राओं ने उसके मन की शांति छीन ली है। पहले वह अपने श्रम और भजनों के आनंद से संतुष्ट था। अब न उसे काम में आनंद आता था, न भजन में रस। आखिरकार उसने निश्चय किया कि इन मुद्राओं को वापस कर देना ही उचित है।

अगले ही दिन बढ़ई पंडित जी के आश्रम पहुँचा। उसने हाथ जोड़कर कहा—
“गुरुजी, ये स्वर्ण मुद्राएँ आप वापस रख लीजिए। मैंने अनुभव किया है कि बिना मेहनत का धन सुख नहीं देता। यह धन मुझे लगातार चिंता और बेचैनी में डुबो रहा है। सच्चा सुख तो अपनी मेहनत की कमाई और संतोष में है। मैं फिर से उसी आनंद को पाना चाहता हूँ।”

पंडित जी मुस्कुराए और बोले—
“बेटा, तुमने जीवन का बड़ा सत्य समझ लिया। वास्तव में परिश्रम से अर्जित कमाई ही आत्मिक शांति देती है। पराया धन या बिना मेहनत का धन मनुष्य को भ्रष्ट कर देता है।”

उस दिन से बढ़ई ने पुनः लगन से अपना काम करना शुरू कर दिया। उसके मधुर भजन फिर से गली-मोहल्ले में गूँजने लगे और वह अपने श्रम और संतोष में सुखी रहने लगा।

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निष्कर्ष: बिना मेहनत का धन क्षणिक सुख तो दे सकता है, पर स्थायी शांति और आनंद केवल परिश्रम और ईमानदारी की कमाई में ही है।

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