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।। श्रीसेतुबन्ध रामेश्वर ।।

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इस ज्योतिर्लिङ्ग की स्थापना मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचन्द्रजी ने की थी। इसके विषय में यह कथा कही जाती है-           जब भगवान श्रीरामचन्द्र जी लंका पर चढ़ाई करने के लिये जा रहे थे तब इसी स्थान पर उन्होंने समुद्र तट की वालु से शिवलिङ्ग बनाकर उसका पूजन किया था। ऐसा भी कहा जाता है कि इस स्थान पर ठहरकर भगवान  राम जल पी रहे थे कि आकाशवाणी हुई कि 'मेरी पूजा किये बिना ही जल पीते हो ?' इस वाणी को सुनकर भगवान श्री राम ने बालु से शिवलिङ्ग बनाकर उसकी पूजा की तथा भगवान शिव से रावण पर विजय प्राप्त करने का वर माँगा। उन्होंने प्रसन्नता के साथ यह वर भगवान श्रीराम को दे दिया। भगवान शिव ने लोक कल्याणार्थ ज्योतिर्लिङ्ग के रूप में वहाँ निवास करने की सबकी प्रार्थना भी स्वीकार कर ली। तभी से यह ज्योतिर्लिङ्ग यहाँ विराजमान है।           इस ज्योतिर्लिङ्ग के विषय में एक-दूसरी कथा इस प्रकार कही जाती है- जब भगवान श्री राम, रावण का वध करके लौट रहे थे तब उन्होंने अपना पहला पड़ाव समुद्र के इस पार गन्धमा...

।। शिव रुद्राष्टक स्तोत्रतम् ।।

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नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम् ॥ निराकार मोंकार मूलं तुरीयं, गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम् । करालं महाकाल कालं कृपालुं, गुणागार संसार पारं नतोऽहम् ॥ तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम् । स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा, लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥ चलत्कुण्डलं शुभ्र नेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् । मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥ प्रचण्डं प्रकष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम्। त्रयशूल निर्मूलनं शूल पाणिं, भजेऽहं भवानीपतिं भाव गम्यम् ॥ कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी, सदा सच्चिनान्द दाता पुरारी। चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी, प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥ न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्। न तावद् सुखं शांति सन्ताप नाशं, प्रसीद प्रभो सर्वं भूताधि वासं ॥ न जानामि योगं जपं नैव पूजा, न तोऽहम् सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम् । जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं, प्रभोपाहि आपन्नामामीश शम्भो ॥ र...

।। श्रीनागेश्वर ।।

भगवान शिव का यह प्रसिद्ध ज्योतिर्लिङ्ग गुजरात प्रान्त में द्वारकापुरी से लगभग १७ मील की दूरी पर स्थित है। इस ज्योतिर्लिङ्ग के सम्बन्ध में पुराणों में यह कथा दी हुई है- सुप्रिय नामक एक बड़ा धर्मात्मा और सदाचारी वैश्य था। वह भगवान शिव का अनन्य भक्त था। वह निरन्तर उनके आराधन, पूजन और ध्यान में तल्लीन रहता था। अपने सारे कार्य वह भगवान शिव‌ को अर्पित करके करता था। मन, वचन, कर्म से वह पूर्णतःशिवार्चन में ही तल्लीन रहता था। उसकी इस शिव भक्ति से दारुक नामक एक राक्षस बहुत क्रौधित रहता था। उसे भगवान शिव की यह पूजा किसी प्रकार भी अच्छी नहीं लगती थी। वह निरन्तर इस बातका प्रयत्न किया करता था कि उस सुप्रिय की पूजा-अर्चना में विघ्न पहुँचे। एक बार सुप्रिय नौका पर सवार होकर कहीं जा रहा था। उस दुष्ट राक्षस दारुक ने यह उपयुक्त अवसर देखकर उस नौका पर आक्रमण कर दिया। उसने नौका में सवार सभी यात्रियों को पकड़कर अपनी राजधानी में ले जाकर कैद कर दिया। सुप्रिय कारागार में भी अपने नित्य नियम के अनुसार भगवान शिव की पूजा-आराधना करने लगा। अन्य बन्दी यात्रियों को भी वह शिव भक्ति की प्रेरणा देने लगा। दारुक ने जब अप...