विरह-ज्वर-विनाशकं ब्रह्म-शक्ति स्तोत्रम्-✍️

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विरह-ज्वर-विनाशकं ब्रह्म-शक्ति स्तोत्रम्
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।।श्रीशिवोवाच।।

ब्राह्मि ब्रह्म-स्वरूपे त्वं, मां प्रसीद सनातनि ! परमात्म-स्वरूपे च, परमानन्द-रूपिणि !।।

ॐ प्रकृत्यै नमो भद्रे, मां प्रसीद भवार्णवे। सर्व-मंगल-रूपे च, प्रसीद सर्व-मंगले !।।

विजये शिवदे देवि ! मां प्रसीद जय-प्रदे। 
वेद-वेदांग-रूपे च, वेद-मातः ! प्रसीद मे।।

शोकघ्ने ज्ञान-रूपे च, प्रसीद भक्त वत्सले। सर्व-सम्पत्-प्रदे माये, प्रसीद जगदम्बिके!।।

लक्ष्मीर्नारायण-क्रोडे, स्त्रष्टुर्वक्षसि भारती। 
मम क्रोडे महा-माया, विष्णु-माये प्रसीद मे।।

काल-रूपे कार्य-रूपे, प्रसीद दीन-वत्सले। 
कृष्णस्य राधिके भदे्र, प्रसीद कृष्ण पूजिते!।।

समस्त-कामिनीरूपे, कलांशेन प्रसीद मे। सर्व-सम्पत्-स्वरूपे त्वं, प्रसीद सम्पदां प्रदे!।।

यशस्विभिः पूजिते त्वं, प्रसीद यशसां निधेः। चराचर-स्वरूपे च, प्रसीद मम मा चिरम्।।

मम योग-प्रदे देवि ! प्रसीद सिद्ध-योगिनि। सर्वसिद्धिस्वरूपे च, प्रसीद सिद्धिदायिनि।।

अधुना रक्ष मामीशे, प्रदग्धं विरहाग्निना। स्वात्म-दर्शन-पुण्येन, क्रीणीहि परमेश्वरि !।।

।।फल-श्रुति।।

एतत् पठेच्छृणुयाच्चन, वियोग-ज्वरो भवेत्। 
न भवेत् कामिनीभेदस्तस्य जन्मनि जन्मनि।।

इस स्तोत्र का पाठ करने अथवा सुनने वाले को वियोग-पीड़ा नहीं होती और जन्म-जन्मान्तर तक कामिनी-भेद नहीं होता।

विधि – पारिवारिक कलह, रोग या अकाल-मृत्यु आदि की सम्भावना होने पर इसका पाठ करना चाहिये। प्रणय सम्बन्धों में बाधाएँ आने पर भी इसका पाठ अभीष्ट फलदायक होगा।

अपनी इष्ट-देवता या भगवती गौरी का विविध उपचारों से पूजन करके उक्त स्तोत्र का पाठ करें। अभीष्ट-प्राप्ति के लिये कातरता, समर्पण आवश्यक है.

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