आषाढ़ शुक्ल द्वितीया और श्री जगन्नाथ रथ यात्रा पर विशेष लेख

भूमिका

भारतीय सनातन संस्कृति में उत्सव और तीर्थ यात्रा का विशेष स्थान रहा है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकाली जाने वाली श्री जगन्नाथ रथ यात्रा इस परंपरा का एक अद्भुत और दिव्य उदाहरण है। यह यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि भक्ति, समर्पण और सनातन संस्कृति की विराटता की साक्षात अभिव्यक्ति है। पूरी दुनिया में प्रसिद्ध यह यात्रा प्रतिवर्ष ओडिशा के पुरी नगर में भव्य रूप से संपन्न होती है, साथ ही देश-विदेश के अनेक स्थानों पर भी श्रद्धा से मनाई जाती है।


-जगन्नाथ जी कौन हैं?

"जगन्नाथ" शब्द का अर्थ है – जगत का नाथ, अर्थात संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी। भगवान श्रीकृष्ण, श्रीबलराम और बहन सुभद्रा के रूप में तीनों स्वरूप पुरी के श्रीमंदिर में पूजित हैं। ये मूर्तियाँ लकड़ी की बनी होती हैं और एक विशेष काल के बाद "नवकलेवर" प्रक्रिया से इनका पुनर्निर्माण होता है, जो स्वयं में अद्वितीय है।


""रथ यात्रा की कथा

पुराणों के अनुसार, एक बार माता सुभद्रा अपने दोनों भाइयों – श्रीकृष्ण और बलराम के साथ द्वारका से बाहर घूमने का आग्रह करती हैं। तीनों रथ पर आरूढ़ होकर नगर भ्रमण को निकलते हैं। इसी प्रसंग की स्मृति में रथ यात्रा निकाली जाती है।

एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद पुनः द्वारका लौटकर जब संसार से लीला संवरण की, तब उनके अवशेष नीलमाधव के रूप में एक लकड़ी के लट्ठे में परिणत हो गए, जो समुद्र के तट पर मिले। उसी दारु (लकड़ी) से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ निर्मित हुईं। भगवान स्वयं कहते हैं कि "जब मैं अपने भक्तों के बीच निकलता हूँ, तब मेरा लोक में साक्षात दर्शन होता है।"


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रथ यात्रा की विशेषता

स्थान: पुरी (ओडिशा) का श्रीमंदिर

तिथि: आषाढ़ शुक्ल द्वितीया

रथ: भगवान जगन्नाथ के लिए ‘नंदीघोष’, बलराम जी के लिए ‘तालध्वज’ और सुभद्रा जी के लिए ‘दर्पदलन’ नामक रथों का निर्माण किया जाता है।

गुंडिचा यात्रा: यह यात्रा श्रीमंदिर से प्रारंभ होकर 3 किमी दूर स्थित गुंडिचा मंदिर तक जाती है, जो भगवान की मौसी का घर माना जाता है। वहाँ भगवान 9 दिन विश्राम करते हैं और फिर 'बहुदा यात्रा' के दिन पुनः लौटते हैं।

---यात्रा का आध्यात्मिक महत्व

1. भक्ति और समर्पण का पर्व: यह यात्रा दर्शाती है कि ईश्वर स्वयं भक्तों के बीच आते हैं, यह भक्त और भगवान के बीच की दूरी को मिटा देती है।


2. सामाजिक समरसता: इस दिन किसी जाति, धर्म या वर्ग का भेद नहीं होता। सभी लोग मिलकर रथ खींचते हैं, जो एकता का प्रतीक है।


3. अहंकार शून्यता: पुरी के राजा को स्वयं रथ की सफाई करनी पड़ती है (छेरा पहरा), यह दर्शाता है कि भगवान के सामने सब समान हैं।




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देश-विदेश में उत्सव

पुरी के अतिरिक्त भारत के अहमदाबाद, वृंदावन, कोलकाता, मुंबई, दिल्ली सहित कई शहरों में भी यह यात्रा निकाली जाती है। विदेशों में इस्कॉन संस्थाओं द्वारा अमेरिका, रूस, यूके, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों में भी रथ यात्रा बड़े धूमधाम से मनाई जाती है।


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उपसंहार

श्री जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का वह दर्पण है जिसमें भक्ति, सेवा, त्याग, समरसता और ईश्वर प्रेम झलकता है। यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि ईश्वर मंदिरों में सीमित नहीं होते, वे जब चाहें, जहाँ चाहें, अपने भक्तों के बीच आ सकते हैं। आइए, इस रथ यात्रा में हम भी भावपूर्वक सहभागी बनें – चाहे रथ खींचकर, चाहे भजन गाकर, चाहे मन में श्रद्धा रखकर।


--जय जगन्नाथ!🌼🙏

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