पेरेंटिंग: एक कला, एक साधना(बालकों के समग्र विकास हेतु एक विचारशील मार्गदर्शन)
प्रस्तावना:
पेरेंटिंग अर्थात् माता-पिता द्वारा अपने संतान के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और नैतिक विकास हेतु किया गया निरंतर प्रयास। यह केवल पालन-पोषण तक सीमित नहीं, बल्कि एक ऐसी यात्रा है, जिसमें माता-पिता एक मार्गदर्शक, मित्र, शिक्षक और संरक्षक के रूप में बालक के जीवन निर्माण में अपनी भूमिका निभाते हैं।
1. पेरेंटिंग का अर्थ केवल पालन नहीं, निर्माण है
बालक जन्म से लेकर युवा अवस्था तक माता-पिता के सान्निध्य में जितना सीखता है, वही आगे चलकर उसका स्वभाव और व्यक्तित्व बनता है। इस निर्माण की प्रक्रिया में —
प्रेम और अनुशासन का संतुलन,
संवाद और सुनने की कला,
प्रेरणा और आदर्श प्रस्तुत करने की भूमिका, बहुत महत्वपूर्ण होती है।
2. आधुनिक युग की चुनौतियाँ
आज के डिजिटल युग में पेरेंटिंग की चुनौतियाँ कई गुना बढ़ गई हैं:
मोबाइल और इंटरनेट की लत,
प्रतिस्पर्धा का बढ़ता दबाव,
पारिवारिक समय की कमी,
नैतिक मूल्यों में गिरावट।
ऐसे में माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के साथ ‘गुणवत्ता समय’ (quality time) बिताएं, उन्हें सिर्फ संसाधन नहीं, अपना समय, स्नेह और मार्गदर्शन दें।
3. संवाद: सफल पेरेंटिंग की कुंजी
बच्चों से संवाद करना केवल बात करना नहीं है, उन्हें ध्यानपूर्वक सुनना, समझना और उनकी भावनाओं का आदर करना भी है। माता-पिता यदि बालकों के पहले मित्र बन जाएं, तो वे हर चिंता, असमंजस और समस्या को खुलकर साझा करते हैं।
4. अनुशासन, पर दंड नहीं
अनुशासन का अर्थ दमन नहीं, दिशा देना है। डांटना-डपटना कभी-कभी आवश्यक हो सकता है, परंतु यदि बार-बार क्रोध, भय या दंड का सहारा लिया जाए, तो बालक या तो विद्रोही बनता है या आत्मग्लानि से भर जाता है।
माता-पिता को चाहिए कि वे कठोर नहीं, दृढ़ हों — “नरम शब्द, पर स्पष्ट दिशा।”
5. बालक को बनाएं आत्मनिर्भर
प्रत्येक माता-पिता की इच्छा होती है कि उनका बच्चा सफल हो। किंतु सफलता का मार्ग तभी संभव है जब उसे स्वयं निर्णय लेना, गलतियों से सीखना, और स्वावलंबी बनना सिखाया जाए। हमेशा सुरक्षा-कवच बने रहना कभी-कभी बच्चों के विकास में बाधा बन सकता है।
6. संस्कारों का बीज बचपन में ही बोएं
बचपन में डाली गई अच्छी आदतें, अच्छी संगत, धार्मिक या नैतिक संस्मरण, प्रतिदिन प्रार्थना, दादी-नानी की कहानियाँ — ये सब बालक के चरित्र निर्माण में अमूल्य योगदान देते हैं।
माता-पिता स्वयं अगर आदर्श प्रस्तुत करें तो बालक सहज रूप से अनुकरण करता है।
7. प्रशंसा और प्रोत्साहन
प्रत्येक बालक में कोई-न-कोई प्रतिभा अवश्य होती है। उस प्रतिभा को पहचानकर उसका उत्साहवर्धन करना पेरेंटिंग का एक महत्त्वपूर्ण दायित्व है।
प्रत्येक छोटी सफलता की सराहना बालक के आत्मविश्वास को कई गुना बढ़ा देती है।
पेरेंटिंग कोई पुस्तक से सीखी जाने वाली विधि नहीं, यह तो संवेदनशीलता, धैर्य, प्रेम और निरंतर सीखने की एक यात्रा है।
माता-पिता अपने आचरण, संस्कार और दृष्टिकोण से ही बालक के जीवन की नींव मजबूत करते हैं।
यदि हम अपने बच्चों को "अच्छे अंक नहीं, अच्छा इंसान" बनने की दिशा दें — तो वही श्रेष्ठ पेरेंटिंग होगी।
विचारणीय पंक्तियाँ:
> "बच्चों को अच्छा इंसान बनाइए, सफल तो वे स्वयं हो ही जाएंगे।"
"बचपन बीज है, पेरेंटिंग उसका माली — जैसा सींचोगे, वैसा ही फल पाओगे।"
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