क्या श्री लोमहर्षण सूत जी वर्णसंकर थे? — एक शास्त्रीय विश्लेषण


✍️
प्रस्तावना:
भारतीय पुराण परंपरा में श्री लोमहर्षण सूत जी का स्थान अत्यंत आदरणीय और केंद्रीय है। वे न केवल व्यासजी के प्रमुख शिष्यों में से एक थे, अपितु समस्त पुराणों के मूल वक्ता और संरक्षक भी माने जाते हैं। किंतु आधुनिक समय में अनेक तथाकथित नवबुद्धिजीवी, सुधारवादियों और आर्यसमाजी विचारधाराओं के प्रभाव में कुछ लोग उन्हें 'वर्णसंकर' या 'सूत जाति' का बताकर उनकी प्रतिष्ठा को कमतर आँकने का प्रयास करते हैं। इस लेख का उद्देश्य है — शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध करना कि श्री लोमहर्षण सूत जी वास्तव में ब्राह्मण ही थे, न कि वर्णसंकर

1. सूत — उपाधि है, जाति नहीं

महाभारत के हरिवंश पुराण में श्रीनीलकंठ की टीका इस भ्रांति का खंडन करती है कि 'सूत' जातिसूचक है। वे स्पष्ट करते हैं कि:

> “इति पौराणिकप्रसिद्धेरग्निजो लोमहर्षणः, तस्य पुत्रः सौतिः उग्रश्रवाः, न तु ‘ब्राह्मण्या क्षत्रियात् सूतः’ इति स्मृत्युक्तः।”



यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि श्री लोमहर्षण जी अग्निकुंड से उत्पन्न ब्राह्मण थे। उनके पुत्र को ‘सौति’ कहा गया — न कि 'सूत' — यह इस बात का प्रमाण है कि यह जातिसूचक नहीं बल्कि तद्वितीय उपनाम था, जैसा कि 'जनक', 'शंकराचार्य' आदि के उत्तराधिकारियों के साथ होता आया है।

2. अग्निकुंड से उत्पत्ति — यौगिक सृष्टि की परंपरा

शिवपुराण और अग्निपुराण दोनों ही सूतजी की अग्निकुंडज उत्पत्ति का वर्णन करते हैं:

> “ब्राह्मणः पौष्करे यज्ञे सुत्याहे वितते सति, पृषदाज्यात् समुत्पन्नः सूतः पौराणिको द्विजः।”



यहाँ वेदाधिकार, ब्राह्मणत्व और पुराणोच्चार के साथ उन्हें द्विज और त्रिकालधर्मवित् कहा गया है। इस प्रकार सूतजी की उत्पत्ति लौकिक गर्भ से नहीं, बल्कि यज्ञ की हवि से हुई — जो उन्हें जन्म से ही ऋषित्व प्रदान करती है।

3. वर्णसंकर होते तो ब्रह्महत्या का दोष क्यों?

श्रीमद्भागवत में जब बलरामजी ने सूतजी का वध किया, तो उन्हें ब्रह्महत्या का दोष लगा। यदि वे वर्णसंकर होते, तो रामायण में श्रवण कुमार के कथन अनुसार, ब्रह्महत्या का दोष न लगता:

> “न द्विजातिरहं राजन्। ब्रह्महत्याकृतं पापं हृदयादपनीयताम्।”



इससे स्पष्ट है कि सूतजी द्विज ही थे — क्योंकि ब्रह्महत्या केवल ब्राह्मण के वध से लगती है।


4. अर्थशास्त्र और कौटिल्य का प्रमाण

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्णसंकरों का निरूपण करते हुए स्पष्ट भेद बताया गया:

> “पौराणिकस्तु अन्यः सूतो मागधश्च, ब्रह्म-क्षत्राद् विशेषः।”



यहाँ दो प्रकार के सूत बताए गए हैं — एक संकर सूत (जो क्षत्रिय और ब्राह्मणी से उत्पन्न होता है), दूसरा पौराणिक सूत जो ब्राह्मणत्व में श्रेष्ठ होता है। इससे यह निष्कर्ष स्पष्ट है कि लोमहर्षण सूतजी 'पौराणिक' सूत हैं — न कि संकर।


5. ब्राह्मणों द्वारा प्रणाम — वर्णसंकर को नहीं

शौनक आदि ऋषियों द्वारा सूतजी को 'ब्रह्मन्' कहकर संबोधित करना:

> “सत्यं ब्रह्मन् वदोपायं नराणां कीर्तिकारकम्।” (भविष्य पुराण)



या फिर:

> “नैमिषे सूतमासीनमभिवाद्य महामतिम्।” (भागवत महात्म्य)



इस बात का संकेत है कि वे पूर्ण ब्राह्मण मान्य थे। किसी वर्णसंकर को वैदिक परंपरा में नमस्कार करना वर्जित है।

6. शास्त्रीय टीकाकारों की राय

महामहोपाध्याय पं. गंगाराम शास्त्री, उदयवीरजी, भगवद्दत्तजी जैसे अनेक विद्वानों ने अपने-अपने ग्रंथों में सूतजी को ब्राह्मण ही सिद्ध किया है। स्वयं आर्यसमाज के कई प्राचीन विद्वानों ने भी यह स्वीकार किया कि पुराणों के सूत जातिसूचक नहीं, बल्कि पदवाचक हैं।

7. अयोनिज उत्पत्तियाँ — पौराणिक परंपरा की सामान्य बात

यदि अग्निकुंड से उत्पत्ति को 'गप्प' कहा जाए, तो फिर द्रौपदी, धृष्टद्युम्न, अंगिरस, वशिष्ठ और अन्य ऋषियों की अग्निज या अयोनिज उत्पत्ति भी अस्वीकार करनी होगी। फिर वेदों और उपनिषदों की आध्यात्मिक उत्पत्ति-संभावनाओं को भी नकारना पड़ेगा — और यह तो सीधा-सीधा सनातन धर्म को ही अस्वीकार करना है।

8. आज की विडम्बना — आत्महीनता और राजनैतिक दासता

यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज के कुछ 'बौद्धिक' लोग, जिन्हें अपने धर्मग्रंथों में श्रद्धा नहीं, वे अपने पूर्वजों को शूद्र या वर्णसंकर सिद्ध करने में ही गौरव मानते हैं। वे किसी भी शास्त्रीय प्रमाण को 'गप्प' कह देते हैं — जबकि उसी पुराण के किसी एक अनुकूल वाक्य को पकड़कर अपने निष्कर्ष निकालते हैं। यह द्वैध मानसिकता केवल राजनीतिक मानसिक गुलामी और धार्मिक हीन भावना का परिणाम है।


श्री लोमहर्षण सूतजी की प्रतिष्ठा केवल उनके ज्ञान, तप और गुरु भक्ति के कारण नहीं है, बल्कि वे शास्त्रों की दृष्टि से ब्राह्मणत्व के सर्वोच्च आदर्श हैं। उन्हें वर्णसंकर कहकर न केवल हमारी परंपरा का अपमान किया जाता है, बल्कि हमारे ऋषियों और संपूर्ण पुराण साहित्य को ही कटघरे में खड़ा किया जाता है।

जो भी सनातन परंपरा में श्रद्धा रखता है, वह कभी इस प्रकार के असंगत निष्कर्षों का समर्थन नहीं कर सकता। अतः अपने पूर्वजों के गौरव को समझें, और सनातन धर्म की गरिमा को तथाकथित नवबौद्धिकता के चश्मे से देखने का प्रयास न करें।





Comments

Popular posts from this blog

पार्थिव शिवलिंग, रुद्राभिषेक और अभिषेक सामग्री का पौराणिक और शास्त्रीय महत्व🌻

🌼 श्राद्ध महिमा : पितृ तर्पण का शास्त्रीय, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार 🌼

🌼 भाद्रपद शुक्ल तृतीया: हरितालिका तीज व्रत का महत्व, कथा और विधि