Posts

Showing posts from 2025

श्री हरी स्तोत्रम्

Image
।। श्रीहरि स्तोत्रम् ।।           जगज्जालपालं चलत्कण्ठमालं                     शरच्चन्द्रभालं महादैत्यकालं।           नभोनीलकायं दुरावारमायं                     सुपद्मासहायम् भजेऽहं भजेऽहं।।          सदाम्भोधिवासं गलत्पुष्पहासं                     जगत्सन्त्रिवासं शतादित्यभासं।           गदाचक्रशस्त्रं लसत्पीतवस्त्रं                      हसच्चारुवक्त्रं भजेऽहं भजेऽहं।।          रमाकण्ठहारं श्रुतिव्रातसारं                      जलान्तर्विहारं धराभारहारं।          चिदानन्दरूपं मनोज्ञस्वरूपं                       ध्रुत...

“भाई दूज पर चित्रगुप्त आराधना – कर्म, धर्म और न्याय की साधना”

Image
🌸 चित्रगुप्त पूजा – न्याय, लेखा और कर्म की आराधना (भाई दूज / यम द्वितीया विशेष) 🔶 भूमिका दीपावली के पावन पर्व के दो दिन बाद आने वाली भाई दूज (यम द्वितीया) का दिन केवल भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक ही नहीं, बल्कि धर्म और न्याय के देवता चित्रगुप्त जी की आराधना का दिन भी है। इस दिन विशेषकर कायस्थ समाज अपने कुलदेवता चित्रगुप्त जी की पूजा करता है, परंतु इसका आध्यात्मिक संदेश सभी के लिए समान है — अपने कर्मों की समीक्षा करना और सत्य के लेखे में खरे उतरना। 🔶 चित्रगुप्त जी का परिचय चित्रगुप्त जी ब्रह्मा जी की काया से उत्पन्न हुए — इसलिए उनका नाम पड़ा “कायस्थ”। “चित्र” का अर्थ है स्पष्ट और बोधगम्य, और “गुप्त” का अर्थ है गुप्त रूप से जानने वाला। इस प्रकार चित्रगुप्त वह दिव्य शक्ति हैं जो प्रत्येक जीव के कर्मों का सूक्ष्म लेखा-जोखा रखती है। यमराज जब किसी आत्मा का निर्णय करते हैं, तो चित्रगुप्त जी के लेखे के आधार पर ही न्याय होता है। 🔶 चित्रगुप्त पूजा का महत्व यह दिन हमें स्मरण कराता है कि— > “कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते, हर कार्य का फल निश्चित है।” चित्रगुप्त जी की पूजा का अर्थ है — ...

🪔"पाँच दिनों का दीप उत्सव : दीपावली के प्रत्येक दिवस का आध्यात्मिक अर्थ"✍️

Image
🌺 दीपोत्सव के पाँच दिन : धनतेरस से भाई दूज तक की परंपरा और पूजा-विधि 🌺 भारत की संस्कृति में दीप केवल प्रकाश का प्रतीक नहीं, बल्कि अंधकार पर ज्ञान की विजय का स्मरण है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से लेकर शुक्ल पक्ष की द्वितीया तक पाँच दिनों का यह दीपोत्सव जीवन में स्वास्थ्य, समृद्धि, धर्म और प्रेम के मूल्यों को जगाने वाला पर्व है। इन पाँच दिनों में — धनतेरस, रूप चौदस, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज — प्रत्येक का अपना महत्व और संदेश है। 🔶 1. धनतेरस (धन्वंतरि जयंती) कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन धनतेरस मनाई जाती है। इस दिन भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्होंने ही आयुर्वेद का प्राकट्य किया था, इसलिए यह दिन स्वास्थ्य और दीर्घायु का प्रतीक है। परंपरा व पूजन-विधि : इस दिन घर में टूटे-फूटे पुराने बर्तन निकालकर नए बर्तन, विशेषकर चाँदी के बर्तन खरीदने की परंपरा है। इन बर्तनों में भगवान गणेश और देवी लक्ष्मी की मूर्तियाँ रखकर पूजन किया जाता है। पूजन के समय यह मंत्र बोला जाता है — “यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये। धनधान्यसम...

🌺श्री राम रक्षा स्तोत्र 🌺

Image
🌺राम रक्षा स्तोत्र🌺 विनियोग: अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः। श्री सीतारामचंद्रो देवता। अनुष्टुप छंदः। सीता शक्तिः। श्रीमान हनुमान कीलकम। श्री सीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः। 🌺🌺अथ ध्यानम्‌:🌺🌺 ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌। वामांकारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं नानालंकार दीप्तं दधतमुरुजटामंडलं रामचंद्रम। . 🌺🌺राम रक्षा स्तोत्र:🌺🌺 चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम्। एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्।। ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्। जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितं।। सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम्। स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्।। . रामरक्षां पठेत प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्। शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः।। कौसल्येयो दृशो पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुति। घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः।। जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः। स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः।। . करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित। मध्यं पातु खरध्वंस...

🌺श्रीकालभैरवपञ्चरत्नस्तुतिः🌺

Image
॥ श्रीकालभैरवपञ्चरत्नस्तुतिः ॥ खड्गं कपालं डमरुं त्रिशूलं हस्ताम्बुजे सन्दधतं त्रिनेत्रम् । दिगम्बरं भस्मविभूषिताङ्गं नमाम्यहं भैरवमिन्दुचूडम् ॥ १॥ कवित्वदं सत्वरमेव मोदान्नतालये शम्भुमनोऽभिरामम् । नमामि यानीकृतसारमेयं भवाब्धिपारं गमयन्तमाशु ॥ २॥ जरादिदुःखौघविभेददक्षं विरागिसंसेव्यपदारविन्दम् । नराधिपत्वप्रदमाशु नन्त्रे सुराधिपं भैरवमानतोऽस्मि ॥ ३॥ शमादिसम्पत्प्रदमानतेभ्यो रमाधवाद्यर्चितपादपद्मम् । समाधिनिष्ठैस्तरसाधिगम्यं नमाम्यहं भैरवमादिनाथम् ॥ ४॥ गिरामगम्यं मनसोऽपि दूरं चराचरस्य प्रभवादिहेतुम् । कराक्षिपच्छून्यमथापि रम्यं परावरं भैरवमानतोऽस्मि ॥ ५॥ इति श‍ृङ्गेरि श्रीजगद्गुरु श्रीसच्चिदानन्दशिवाभिनवनृसिंह- भारतीस्वामिभिः विरचिता श्रीकालभैरवपञ्चरत्नस्तुतिः।

🌺 अथ् श्री सूक्त मंत्र पाठ🌺

Image
।। अथ श्री-सूक्त मंत्र पाठ ।।  1- ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं, सुवर्णरजतस्त्रजाम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आ वह ।। 2- तां म आ वह जातवेदो, लक्ष्मीमनपगामिनीम् । यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम् ।। 3- अश्वपूर्वां रथमध्यां, हस्तिनादप्रमोदिनीम् । श्रियं देवीमुप ह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम् ।। 4- कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् । पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप ह्वये श्रियम् ।। 5- चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् । तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ।।   6- आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः । तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः ।। 7- उपैतु मां दैवसखः, कीर्तिश्च मणिना सह । प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ।। 8- क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् । अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वां निर्णुद मे गृहात् ।। 9- गन्धद्वारां दुराधर्षां, नित्यपुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरीं सर्वभूतानां, तामिहोप ह्वये श्रि...

🌺अहोई अष्टमी व्रत एवं उद्यापन 🌺

Image
🌺 अहोई अष्टमी व्रत एवं उद्यापन विधि कार्तिक कृष्ण अष्टमी — दीपावली से लगभग एक सप्ताह पूर्व। इस दिन माताएँ अपनी संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए उपवास रखती हैं। 🕉️ संकल्प मंत्र स्नान कर पूजन-स्थान पर कलश स्थापित करें और दाहिने हाथ में जल, अक्षत, फूल लेकर संकल्प करें — > मंत्र: मम पुत्र-पौत्रादि-सहित कुल की रक्षा-सुख-समृद्धि-द्वारा चिरायु-सिद्धये अहोई अष्टमी-व्रतं अहं करिष्ये। अहोई माता-सप्तऋषि-सहित पूजनं च उद्यापनं च करिष्ये। 🌿 पूजन सामग्री अहोई माता एवं स्याह (नेवला) का चित्र चांदी की अहोई माता (उद्यापन हेतु) कलश, चावल, दूध, बताशे, रोली, मौली, अक्षत दीपक, जल पात्र, धूप सात प्रकार के अनाज (सप्तधान्य) वस्त्र, दक्षिणा, मिठाई, फल सात या बारह सुहागिन स्त्रियाँ 🌼 पूजा-विधि 1. सायंकाल तारा उदय से पूर्व पूजन प्रारंभ करें। 2. अहोई माता और स्याह (नेवला) का चित्र बनाकर या टाँगकर दीपक जलाएँ। 3. माता की कथा सुनें या स्वयं पढ़ें। 4. जल से अर्घ्य देकर तारा और अहोई माता को प्रणाम करें। 5. सन्तान की कुशलता, आयु और सुख के लिए प्रार्थना करें। 📜 अहोई माता की कथा एक बार किसी नगर ...

🌺साधना में संतुलन का महत्व ✍️

Image
🕉️ *साधना में संतुलन का महत्व*   साधना का अर्थ केवल ध्यान या जप नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन बनाना है। जब साधक बाहरी कर्म और भीतर की शांति में सामंजस्य रखता है, तभी साधना फल देती है। अत्यधिक कठोरता मन को थका देती है और अधिक ढीलापन आलस्य लाता है। संतुलन वह मार्ग है जहाँ प्रयास भी है और स्वीकार भी। यह समझना आवश्यक है कि आत्मविकास की गति तब स्थिर होती है जब साधक अपनी सीमाओं और सामर्थ्य दोनों को पहचानता है। संतुलित साधना ही स्थायी शांति और आंतरिक बल प्रदान करती है।   🌿 *संतुलन ही साधना की पूर्णता*

🌕 करवा चौथ : प्रेम, श्रद्धा और चंद्र-ऊर्जा का पर्व✍️

Image
🌕 करवा चौथ : प्रेम, श्रद्धा और चंद्र-ऊर्जा का पर्व 🌕 ☯️ नारी-पुरुष ऊर्जा का संतुलन सृष्टि दो शक्तियों पर आधारित है – नारी की करुणा और पुरुष की दृढ़ता। जब ये दोनों ऊर्जा एक-दूसरे के पूरक बनती हैं, तभी जीवन में सामंजस्य और शांति आती है। नारी में सृजन की कोमलता है, पुरुष में संरक्षण की शक्ति। यदि पुरुष अहंकार त्यागे और नारी संवेदनशीलता को जागृत रखे, तो दोनों मिलकर एक दिव्य संतुलन रचते हैं। यही संतुलन घर, समाज और विश्व में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह करता है। 🌸 संतुलन में ही सृष्टि की सुंदरता है। 🌸 करवा चौथ का महत्व करवा चौथ का व्रत स्त्रियों का मुख्य त्यौहार है। यह व्रत सुहागन महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य की मंगल कामना से करती हैं। यह पर्व कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। परंपरागत रूप से विवाहित स्त्रियाँ इसे रखती हैं, किंतु अब कई कन्याएँ भी योग्य वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत का पालन करती हैं। यह पर्व केवल एक व्रत नहीं, बल्कि नारी के प्रेम, त्याग और शक्ति का प्रतीक है — जो दिनभर निर्जल रहकर अपने प्रिय की सुरक्षा और सुख की कामना करती है।...

🌕शरद पूर्णिमा🌕

Image
🌕 शरद पूर्णिमा : अमृत, सौंदर्य और साधना की रात्रि 🌸 1. भूमिका : जब प्रकृति अमृतमयी हो उठती है वर्षा के बाद जब धरती की नमी ठहर जाती है, आकाश निर्मल हो उठता है और चंद्रमा अपनी उज्ज्वलता में खिलता है — तब आती है शरद पूर्णिमा। यह वह रात्रि है जब चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और सम्पूर्ण आकाश अमृतमयी दीप्ति से भर उठता है। भारतीय परंपरा में यह रात केवल एक चंद्र पर्व नहीं, बल्कि प्रकाश, प्रेम और साधना की प्रतीक है। 🕯️ 2. ‘शरद’ का अर्थ और कोजागरी पूर्णिमा का रहस्य संस्कृत शब्द ‘शरद्’ का अर्थ है — शीतल, निर्मल और उज्ज्वल। इस पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। कहावत है — इस रात माँ लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और पुकारती हैं — > “को जागर्ति?” — अर्थात “कौन जाग रहा है?” जो व्यक्ति इस रात भक्ति, ध्यान या साधना में जागता है, उस पर लक्ष्मी की कृपा होती है। इसलिए इसे जागरण और समृद्धि की रात कहा गया है। 📜 3. शास्त्रीय प्रमाण : पुराणों में शरद पूर्णिमा (क) पद्म पुराण में कहा गया है — > “शरद्पूर्णिमायां रात्रौ यः पूजां कुरुते मम। धनधान्यसमृद्धिः स्यात् लक्ष्म्या...

✍️स्वस्थ जीवन का रहस्य – प्रसन्न रहने की कला🌺

🌿 प्रसन्नता ही स्वास्थ्य की कुंजी : मन, शरीर और आत्मा का संतुलन 🧠 मन और शरीर का गहरा संबंध मनुष्य का जीवन केवल शरीर तक सीमित नहीं है। विचार, भावनाएँ और चेतना शरीर को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। नकारात्मक भावनाएँ (भय, क्रोध, ईर्ष्या, चिंता) → शरीर में तनाव हार्मोन उत्पन्न करती हैं, जो हृदय, पाचन और रोग-प्रतिरोधक क्षमता को नुकसान पहुँचाते हैं। सकारात्मक भावनाएँ (प्रेम, दया, संतोष, प्रसन्नता) → हैप्पी हार्मोन (सेरोटोनिन, एंडॉर्फिन) उत्पन्न करते हैं, जो शरीर को स्वस्थ और मन को शांत रखते हैं। शास्त्रीय दृष्टिकोण 👉 “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।” (अमृतबिन्दु उपनिषद् 2) अर्थात् मनुष्य का मन ही बंधन और मुक्ति का कारण है। 👉 “सर्वं दुःखं विवर्जय्य सर्वसुखमवाप्नुयात्।” (मनुस्मृति 4/160) अर्थात् दुःखदायी विचारों को त्यागने वाला ही सच्चे सुख को प्राप्त करता है। 📖 विज्ञान भी यही कहता है प्रोफेसर एल. मर्गेट के वैज्ञानिक प्रयोग बताते हैं कि – नकारात्मक विचारों से पसीना, थूक, श्वास और रक्त में जहरीले तत्व उत्पन्न होते हैं। सकारात्मक विचारों से स्वास्थ्य-वर्धक तत्व और ऊर्जा पैदा होती...

🌺महालक्ष्मी व्रत एवं हाथी पूजा 🌺

Image
🌺 महालक्ष्मी व्रत एवं हाथी पूजा 🌺 भूमिका भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से लेकर आश्विन कृष्ण अष्टमी तक १६ दिनों तक चलने वाला महालक्ष्मी व्रत विशेषकर उत्तर भारत और महाराष्ट्र में बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है। इस व्रत को हाथी पूजा भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का हाथी पर विराजमान स्वरूप पूजित होता है। लोक विश्वास है कि इस व्रत के प्रभाव से दरिद्रता दूर होती है, सौभाग्य की वृद्धि होती है और घर-आँगन में स्थायी लक्ष्मी का वास होता है। 🌺महत्त्व यह व्रत विशेषकर विवाहित स्त्रियाँ करती हैं, जिससे पति की दीर्घायु, परिवार की समृद्धि और अखंड सौभाग्य प्राप्त होता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य स्त्रियाँ इसे प्रमुखता से करती हैं, परंतु इच्छुक कोई भी कर सकता है। १६ दिनों तक माता लक्ष्मी के विभिन्न रूपों का पूजन कर अन्न-धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। पूजन विधि आवश्यक सामग्री गणेशजी की मूर्ति, महालक्ष्मीजी का चित्र या प्रतिमा, हाथी के प्रतीक (मिट्टी/धातु/चित्र), कलश, वस्त्र, पुष्पमाला, फल, पंचामृत, रोली, चावल, हल्दी, दूर्वा, कपूर, दीपक, धूप, मिठाई, रेशमी कपड़े, न...

✍️शिवजी के पिनाक धनुष की प्रमाणिक कथा : राम-सीता विवाह का अद्भुत रहस्य🌺

Image
शिवजी के पिनाक धनुष की प्रमाणिक कथा : राम-सीता विवाह का अद्भुत रहस्य सनातन धर्म में देवताओं के शस्त्र केवल युद्ध के उपकरण नहीं होते, बल्कि उनमें ब्रह्मांडीय रहस्य और दिव्यता छिपी होती है। भगवान शिव का धनुष पिनाक भी ऐसा ही एक दिव्य आयुध है, जिसकी गाथा अत्यंत अद्भुत है। यही वही धनुष है जिसे मिथिला नरेश जनक जी ने अपनी पुत्री सीता के स्वयंवर की शर्त बनाया था। आइए, इस पावन कथा को शास्त्रीय प्रमाणों सहित जानें। कण्व ऋषि की तपस्या और अद्भुत बाँस प्राचीन समय में कण्व ऋषि वन में गहन तपस्या कर रहे थे। दीर्घ समाधि में लीन होने पर उनके शरीर पर दीमकों ने बाँबी बना दी और उसी पर एक अद्भुत बाँस उग आया। तपस्या पूर्ण होने पर ब्रह्मा जी प्रकट हुए। उन्होंने कण्व ऋषि को वरदान देकर उस बाँस को देखा और विचार किया कि इसका विशेष प्रयोजन होना चाहिए। अतः उन्होंने इसे काटकर देवशिल्पी विश्वकर्मा को सौंप दिया। विश्वकर्मा द्वारा दिव्य धनुषों का निर्माण विश्वकर्मा ने उस अद्भुत बाँस से दो अनुपम धनुष बनाए — सारंग धनुष : भगवान विष्णु को अर्पित किया। पिनाक धनुष : भगवान शिव को समर्पित किया। शि...

🌼 श्राद्ध महिमा : पितृ तर्पण का शास्त्रीय, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार 🌼

Image
भूमिका : कृतज्ञता की संस्कृति सनातन धर्म का एक अद्भुत पुष्प है कृतज्ञता। माता-पिता ने हमें जन्म दिया, पाला-पोसा, संस्कार दिए। उनके जीवन रहते सेवा करना धर्म है, किंतु उनके देहावसान के बाद भी उनके कल्याण का भाव रखना और उनके अधूरे कार्यों को पूरा करना ही श्राद्ध कहलाता है। यह केवल एक कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि आभार, स्मरण और कृतज्ञता की संस्कृति है। श्राद्ध का दार्शनिक आधार शास्त्र कहते हैं – मृत्यु के बाद जीवात्मा अपने कर्मानुसार स्वर्ग, नरक या पितृलोक में जाती है। जो पितृयान मार्ग से जाते हैं, वे चन्द्रलोक में अमृतान्न का सेवन करते हैं। यह अन्न कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा की कलाओं के साथ क्षीण होता है। इसलिए वंशजों को इस अवधि में श्राद्ध, पिण्डदान और तर्पण करना आवश्यक है। वैज्ञानिक एवं प्रतीकात्मक दृष्टि अक्सर शंका की जाती है कि यहाँ दिया गया अन्न पितरों तक कैसे पहुँचता है? इसे समझना सरल है – जैसे रुपया डॉलर और पाउंड में परिवर्तित होकर विदेश में मिल सकता है, वैसे ही ईश्वर की सर्वसमर्थ सत्ता हमारे द्वारा अर्पित अन्न को पितरों तक उनके योग्य रूप में पहुँचा देती है। आज जब दूरभाष व दूरदर्...

🌺भगवान के वाहन पशु ही क्यों होते हैं?प्रतीकात्मक रहस्य और आध्यात्मिक संदेश✍️

Image
भूमिका🌺 जब हम देवताओं की मूर्तियों या चित्रों को देखते हैं तो अक्सर उनकी सवारी पर ध्यान जाता है— गणेश जी मूषक पर, दुर्गा जी सिंह पर, शिव जी नंदी पर, विष्णु जी गरुड़ पर। सवाल उठता है—“देवताओं जैसे सर्वशक्तिमान के वाहन पशु-पक्षी ही क्यों हैं?” क्या यह केवल कल्पना है, या इसके पीछे कोई गहरा अर्थ छिपा है? वास्तव में, यह भारतीय संस्कृति की अद्भुत परंपरा है, जहाँ हर प्रतीक में शिक्षा छिपी है। देवताओं के वाहन हमें यह याद दिलाते हैं कि मनुष्य अकेला नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि का एक हिस्सा है। हर पशु-पक्षी हमारे भीतर की किसी प्रवृत्ति, शक्ति या कमजोरी का प्रतीक है। जब देवता उन पर आरूढ़ दिखते हैं, तो वे यही संदेश देते हैं— 👉 “अपनी प्रवृत्तियों पर विजय पाओ, उन्हें साधो और दिव्यता प्राप्त करो।” शास्त्रीय प्रमाण 📖 भगवद्गीता (१३.२८) > समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्। विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥ भावार्थ: जो यह देखता है कि परमेश्वर सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित हैं, वही सच्चा ज्ञानी है। 📖 मनुस्मृति (६.७५) > अद्रोहेणैव भूतेषु यः तिष्ठति समाहितः। स यात...

🌺अनंत चतुर्दशी का महत्व और व्रत का विधान 🌺

Image
अनंत चतुर्दशी का महात्म्य और व्रत-विधान ✨ प्रस्तावना ‘अनन्त’ शब्द स्वयं में ही ब्रह्माण्ड की अनन्तता का द्योतक है। आकाश अनन्त है, सागर अनन्त है, वायु अनन्त है, पृथ्वी और अग्नि भी अनन्त हैं। विज्ञान जितना भी आगे बढ़ जाए, सृष्टि के रहस्यों का केवल अंश मात्र ही जान पाता है। यही कारण है कि हमारे ऋषियों ने इसे अनन्त कहा और इस अनन्त सृष्टि के अधिपति भगवान विष्णु को स्वीकार किया। भगवान विष्णु का वास जल में माना गया है। जल ही जीवन का आधार है और किसी भी ग्रह पर जीवन की सम्भावना जल से ही आँकी जाती है। इसी कारण भगवान विष्णु का अनन्त स्वरूप जल के अधिष्ठाता के रूप में पूजनीय है। अनन्त चतुर्दशी का यह पर्व विष्णु के उसी अनन्त रूप को स्मरण कराने वाला है। 📅 अनन्त चतुर्दशी का समय और तिथि यह व्रत भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को किया जाता है। 2025 में तिथि: शनिवार, 06 सितम्बर 2025 चतुर्दशी प्रारम्भ: 06 सितम्बर, प्रातः 05:18 बजे चतुर्दशी समाप्ति: 07 सितम्बर, प्रातः 06:41 बजे चतुर्दशी तिथि के देवता भगवान शंकर हैं। 🙏 व्रत-विधान 1. प्रातः स्नान कर संकल्प लें। 2. स्वच्छ स्थान पर कलश स्थापित कर भगवान वि...

🌺पृथ्वी को धारण करने वाले सात स्तंभ ✍️

Image
पृथ्वी को धारण करने वाले सात तत्व जिनकी वजह से सनातन धर्म युगों युगों से है और सदा रहेगा भी। "गोभिर्विप्रैश्च वेदैश्च , सतीभिः सत्यवादिभिः l अलुब्धैर्दानशीलैश्च , सप्तभि धार्यते मही।।" गाय, ब्राह्मण, वेद , सती स्त्री ,सत्यवादी इंसान , निर्लोभी और दानी इन सात की वजह से ही पृथ्वी टिकी हुई है ।

🌺भविष्य की नींव: विद्यार्थी और उसका लक्ष्य🌺

Image
🎯 *लक्ष्य ही देता है दिशा*   विद्यार्थी जीवन वह समय है जब मन सबसे अधिक सीखने और आगे बढ़ने के लिए तत्पर रहता है। इस अवस्था में यदि लक्ष्य स्पष्ट हो तो मेहनत भी सार्थक होती है। बिना लक्ष्य के अध्ययन करना वैसा ही है जैसे बिना दिशा का जहाज़। लक्ष्य ही विद्यार्थी को अनुशासन, परिश्रम और धैर्य का मार्ग दिखाता है। जब विद्यार्थी अपने सपनों को लक्ष्य बनाकर प्रयास करता है, तो सफलता निश्चित होती है। विद्यार्थी जीवन में निर्धारित लक्ष्य ही भविष्य की ठोस नींव रखते हैं।   🎯 *लक्ष्य से ही मिलती सफलता*

🌺विचार हमारे जीवन के बीज हैं 🌺

Image
🌱✨ विचार हमारे जीवन के बीज हैं। आज जो अनुभव हम कर रहे हैं, वो कल बोए गए विचारों का ही फल है। अगर बीज क्रोध, ईर्ष्या या तनाव के हैं, तो फल भी वैसा ही होगा। लेकिन अगर बीज शांति, करुणा और शुभभावना के हैं, तो जीवन अपने आप मधुर और शांतिमय बन जाएगा। हर विचार को बोने से पहले खुद से पूछें – 👉 क्या ये बीज मेरे मन को शांति देंगे? 👉 क्या ये बीज मेरे रिश्तों को मधुर बनाएंगे? याद रखिए: बीज वही चुनें, जो आपके जीवन को उज्जवल बनाए।

🌺संतान सप्तमी व्रत 🌺

मुक्ताभरण संतान सप्तमी विशेष ==================== भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की सप्तमी का व्रत अपना विशेष महत्व रखता है। संतान सप्तमी व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष कि सप्तमी तिथि के दिन किया जाता है। इस वर्ष 30 अगस्त शनिवार के दिन मुक्ताभरण संतान सप्तमी व्रत किया जाएगा। यह व्रत विशेष रुप से संतान प्राप्ति, संतान रक्षा और संतान की उन्नति के लिये किया जाता है। इस व्रत में भगवान शिव एवं माता गौरी की पूजा का विधान होता है।  संतान सप्तमी व्रत विधि  -------------------------------- सप्तमी का व्रत माताओं के द्वारा  अपनी संतान के लिये किया जाता है। इस व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विधान है। इस व्रत में अपराह्न तक पूजा-अर्चना करने का विधान है। इस व्रत को करने वाली माता को प्रात:काल में स्नान और नित्यक्रम क्रियाओं से निवृ्त होकर, स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद प्रात काल में श्री  भगवान शिव पार्वती की पूजा अर्चना करनी चाहिए। और सप्तमी व्रत का संकल्प लेना चाहिए। निराहार व्रत कर, दोपहर को चौक पूरकर चंदन, अक्षत, धूप, दीप, नैवेध, सुपारी तथा नारियल आदि से फिर से...

🌺 ऋण मोचन महा गणपति स्तोत्र एवं ऋण और दरिद्रता से मुक्ति का दिव्य उपाय,🌺

Image
🍁 ऋणमोचन महागणपति स्तोत्र: ऋण और दरिद्रता से मुक्ति का दिव्य उपाय भारतीय परंपरा में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता कहा गया है। हर शुभ कार्य की शुरुआत गणेश पूजन से होती है। ब्रह्माण्डपुराण में वर्णित ऋणमोचन महागणपति स्तोत्र विशेष रूप से ऋण से मुक्ति, दरिद्रता नाश और जीवन में सुख-समृद्धि लाने वाला माना गया है। 📖 ऋणमोचन महागणपति स्तोत्र का महत्व जो साधक इस स्तोत्र का प्रातःकाल नियमित पाठ करता है, उसके जीवन में छः माह के भीतर ऋण का निवारण होने लगता है। यह स्तोत्र न केवल आर्थिक ऋण मिटाता है बल्कि मानसिक बोझ और जीवन की अड़चनें भी दूर करता है। गणपति की आराधना के साथ यदि ऋणहर गणेश स्तोत्र, गणेशलक्ष्मी स्तोत्र, गणेश अष्टकम और गणपति चालीसा-आरती का पाठ किया जाए, तो साधक के पारिवारिक जीवन से दरिद्रता का नाश होकर समृद्धि आने लगती है। 🌺 पूजन विधि और नियम समय : प्रातःकाल स्नान करके गणेश प्रतिमा/चित्र के सामने बैठें। सामग्री : दूर्वा (दूब घास), लाल-पीले पुष्प, गुड़ या मोदक का भोग, दीप और धूप। ध्यान : रक्तवर्ण, त्रिनेत्र, चन्द्रमौलि स्वरूप वाले महागणपति का ध्यान कर...

🌺काशी के युवराज ढुंढीराज गणपति: हर खोज के अधिपति🌺

Image
प्रस्तावना,,🙏 गंगा की लहरों पर झिलमिलाती आरती, घंटों की गूंज से भरी काशी की रात्री। जहाँ हर गली में शिव का वास है, वहाँ युवराज ढुंढीराज का भी त्रास है। कहते हैं— काशी के द्वार पर सबसे पहले स्वागत करते हैं बाल गणपति। जो खोजो, वही मिल जाए—ऐसे हैं ढुंढीराज। स्वयं महादेव ने स्वीकारा— "काशी में मेरा प्रवेश भी पुत्र गणेश के प्रसाद से ही सम्भव हुआ।" इसीलिए इस अनंत पुरी में हर साधक की पहली प्रार्थना ढुंढीराज को समर्पित होती है। जहाँ स्वयं शिव भी पुत्र की अनुमति से प्रवेश पाए कथा है—जब भगवान शंकर ने काशी में निवास करने का निश्चय किया, तब वे पुरी के द्वार पर पहुँचे। वहाँ बाल स्वरूप में गणेश खड़े थे। शिव ने कहा— “बेटा, मुझे काशी में प्रवेश दो।” गणेश मुस्कराकर बोले— “बाबा! यहाँ का विधान अलग है। जब तक मैं प्रसन्न न होऊँ, कोई प्रवेश नहीं पा सकता। आप भी इस नियम से बाहर नहीं।” शिव विस्मित हुए और बोले— “सत्य है। इस पुरी में मेरा आगमन भी तुम्हारे प्रसाद से ही हुआ है। जो कार्य पिता के लिए भी कठिन हो, पुत्र से वह सरल हो जाता है। इसका उदाहरण मैं स्वयं हूँ।” ढुंढने से लेकर मोक्ष तक का...

🌺अष्टविनायक: आठों स्वयंभू गणेश और उनकी चमत्कारिक कथाएँ🌺

Image
🌸 अष्टविनायक यात्रा: कथा, भक्ति और महिमा 🌸 परिचय महाराष्ट्र में आठ स्वयंभू गणेशजी इतने प्रसिद्ध हैं कि उन्हें एक साथ अष्टविनायक कहा जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि जो भक्त इन आठ गणेशजी की परिक्रमा करता है, उसके जीवन से सभी विघ्न दूर होते हैं और उसे बुद्धि, सिद्धि और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस यात्रा की शुरुआत और समापन मोरेश्वर (मोरेगांव) से होती है। आइए जानते हैं क्रमवार आठों गणेशजी की विस्तृत कथाएँ, स्थान और महिमा— 1️⃣ मोरेश्वर गणपति (मोरेगांव, पुणे) बहुत समय पहले, सिंधुरासुर नामक दैत्य ने पृथ्वी पर अराजकता फैला दी थी। वह न केवल देवताओं के लिए, बल्कि साधारण मनुष्यों के लिए भी संकट बन गया था। लोग, राजा और ऋषि सब उसकी क्रूरता से पीड़ित थे। देवताओं ने ब्रह्माजी से प्रार्थना की कि इस संकट का नाश कौन करेगा। ब्रह्मा ने गणेशजी की ओर इशारा किया। गणेशजी मोर पर सवार होकर युद्धभूमि में आए। उनका तेजस्वी रूप देखकर दैत्य डर गया, पर उसने हार नहीं मानी। गणेशजी ने अपनी बुद्धि और दिव्य शक्ति से दैत्य का संहार किया। तब से मोरेश्वर की कृपा से सभी भक्त विघ्नों से मुक्त ...

🌼 भाद्रपद शुक्ल तृतीया: हरितालिका तीज व्रत का महत्व, कथा और विधि

Image
🌼 भाद्रपद शुक्ल पक्ष तीजा व्रत (हरितालिका तीज) 🌼 ✨ व्रत का महत्व भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरितालिका तीज कहा जाता है। यह व्रत विशेषतः सुहागिन स्त्रियों और कन्याओं द्वारा अखण्ड सौभाग्य, दांपत्य सुख और शिव-पार्वती जैसे अटूट दाम्पत्य के लिए किया जाता है। 🕉️ व्रत-विधि 1. प्रातःकाल स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 2. व्रती स्त्रियाँ निर्जल अथवा फलाहार व्रत का संकल्प लें। 3. मिट्टी अथवा रज से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाकर पूजा स्थान पर स्थापित करें। 4. कलश-स्थापना करें और उसमें जल, आम्रपल्लव, नारियल रखें। 5. अब दीप प्रज्वलित कर धूप, फूल, फल, वस्त्र आदि से शिव-पार्वती का पूजन करें। 6. सुहाग-सामग्री अर्पित करें और कथा का श्रवण करें। 7. रात्रि जागरण कर अगले दिन प्रातः पारण करें। मंत्र-पाठ (पूजा के साथ) 1. शिव स्तुति मंत्र ॐ नमः शिवाय शान्ताय सौम्याय सुखदाय च। भक्तानामभयदाय नमः शंकराय ते॥ 2. पार्वती स्तुति मंत्र सदा सौम्या सदा शान्ता सदा सौभाग्यदायिनी। पातु मां पार्वती देवी महाशक्ति नमोऽस्तु ते॥ 3. संकल्प मंत्र मम अखण्ड-सौभाग्य-लाभ-परिपूर्ण-दाम्पत्य-सुख-स...