✍️शिवजी के पिनाक धनुष की प्रमाणिक कथा : राम-सीता विवाह का अद्भुत रहस्य🌺
शिवजी के पिनाक धनुष की प्रमाणिक कथा : राम-सीता विवाह का अद्भुत रहस्य
सनातन धर्म में देवताओं के शस्त्र केवल युद्ध के उपकरण नहीं होते, बल्कि उनमें ब्रह्मांडीय रहस्य और दिव्यता छिपी होती है। भगवान शिव का धनुष पिनाक भी ऐसा ही एक दिव्य आयुध है, जिसकी गाथा अत्यंत अद्भुत है। यही वही धनुष है जिसे मिथिला नरेश जनक जी ने अपनी पुत्री सीता के स्वयंवर की शर्त बनाया था। आइए, इस पावन कथा को शास्त्रीय प्रमाणों सहित जानें।
कण्व ऋषि की तपस्या और अद्भुत बाँस
प्राचीन समय में कण्व ऋषि वन में गहन तपस्या कर रहे थे। दीर्घ समाधि में लीन होने पर उनके शरीर पर दीमकों ने बाँबी बना दी और उसी पर एक अद्भुत बाँस उग आया।
तपस्या पूर्ण होने पर ब्रह्मा जी प्रकट हुए। उन्होंने कण्व ऋषि को वरदान देकर उस बाँस को देखा और विचार किया कि इसका विशेष प्रयोजन होना चाहिए। अतः उन्होंने इसे काटकर देवशिल्पी विश्वकर्मा को सौंप दिया।
विश्वकर्मा द्वारा दिव्य धनुषों का निर्माण
विश्वकर्मा ने उस अद्भुत बाँस से दो अनुपम धनुष बनाए —
- सारंग धनुष : भगवान विष्णु को अर्पित किया।
- पिनाक धनुष : भगवान शिव को समर्पित किया।
शिवजी ने इसी धनुष को धारण कर असुरों के संहार किए। इसी कारण वे पिनाकी कहलाए।
(महाभारत, अनुशासन पर्व, 17.73 — शिव सहस्रनाम में “पिनाकी” नाम)
पिनाक धनुष की शक्ति
पिनाक धनुष असाधारण सामर्थ्य से युक्त था। इसकी टंकार से आकाश फट जाता और पृथ्वी डगमगा उठती।
इसी धनुष के एक बाण से भगवान शंकर ने त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया।
(शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता, अध्याय ३२-३४)
जनक वंश तक पिनाक की यात्रा
त्रिपुरासुर वध के बाद देवताओं ने यह धनुष मिथिला नरेश निमि के पुत्र देवरात को प्रदान किया। तब से यह धनुष जनक वंश की धरोहर बन गया।
वाल्मीकि रामायण में स्वयं राजा जनक कहते हैं —
"किलैतद् धनुर् दिव्यम् देवार्चितम् अनुत्तमम्।
जनकानाम् महायोग्यात् धरोहम् सततम् मया॥"
(बालकाण्ड 66.12-14)
(अर्थ: यह दिव्य और अनुपम धनुष है, देवताओं द्वारा पूजित, और जनक वंश की धरोहर के रूप में मेरे पास सुरक्षित है।)
सीता और धनुष
बाल्यावस्था में एक बार सीता जी ने खेलते-खेलते इस धनुष को उठा लिया।
जनक जी यह देखकर अचंभित रह गए और समझ गए कि सीता कोई साधारण कन्या नहीं हैं।
इसीलिए उन्होंने निश्चय किया कि सीता का विवाह उसी से होगा जो इस शिव-धनुष को उठा सके।
(वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड 67.13)
स्वयंवर और राम का विजय-प्रसंग
जनक जी ने घोषणा की — जो भी शिव धनुष को उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाएगा और तोड़ेगा, वही सीता का पति बनेगा।
सभी राजाओं ने प्रयास किया, पर कोई सफल न हुआ। अंततः गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से श्रीराम आगे बढ़े। उन्होंने सहज भाव से पिनाक को उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते ही धनुष दो टुकड़े हो गया।
"ततः कृत्स्नम् धनुः रामः सन्दधे सहसा बली।
ततश् चास्य धनुः कृत्स्नम् भङ्गम् आजग्मिविस्फुरत्॥"
(वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड 67.18-19)
सभा में गगनभेदी नाद गूँज उठा और इसी के साथ राम-सीता का दिव्य मिलन हुआ।
परशुराम का क्रोध
धनुष टूटने की गड़गड़ाहट से पृथ्वी और आकाश काँप उठे। उसी ध्वनि को सुनकर भगवान परशुराम सभा में पहुँचे।
(वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड 70.1-3)
शंकर के परमभक्त होने के कारण वे क्रुद्ध हुए, परंतु राम के तेज, मर्यादा और विष्णुत्व को पहचानकर शांत हो गए और उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया।
सारांश
पिनाक धनुष केवल एक शस्त्र नहीं था, बल्कि तप, संकल्प और दिव्यता का प्रतीक था।
राम-सीता का विवाह केवल एक पारिवारिक घटना नहीं, बल्कि नियति का दिव्य विधान था, जिसमें पिनाक धनुष माध्यम बना।
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